Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 514

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ सो꣢म दे꣣व꣡वी꣢तये꣣ सि꣢न्धु꣣र्न꣡ पि꣢प्ये꣣ अ꣡र्ण꣢सा । अ꣣ꣳशोः꣡ पय꣢꣯सा मदि꣣रो꣡ न जागृ꣢꣯वि꣣र꣢च्छा꣣ को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣡त꣢म् ॥५१४॥

प्र꣢ । सो꣣म । दे꣡व꣢वीतये । दे꣣व꣢ । वी꣣तये । सि꣡न्धुः꣢꣯ । न । पि꣣प्ये । अ꣡र्ण꣢꣯सा । अँ꣣शोः꣢ । प꣡य꣢꣯सा । म꣣दिरः꣢ । न । जा꣡गृ꣢꣯विः । अ꣡च्छ꣢꣯ । को꣡श꣢꣯म् । म꣣धुश्चु꣡त꣢म् । म꣣धु । श्चु꣡त꣢꣯म् ॥५१४॥

Mantra without Swara
प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा । अꣳशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्चुतम् ॥

प्र । सोम । देववीतये । देव । वीतये । सिन्धुः । न । पिप्ये । अर्णसा । अँशोः । पयसा । मदिरः । न । जागृविः । अच्छ । कोशम् । मधुश्चुतम् । मधु । श्चुतम् ॥५१४॥

Samveda - Mantra Number : 514
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (देववीतये) मुमुक्षुजनों की तृप्ति के लिये आनन्द से पूर्ण है (सिन्धुः-न-अर्णसा प्रपिप्ये) जैसे सिन्धु जल से पूर्ण होता है (अंशोः पयसा) तुझ सोम—शान्त रसीले परमात्मा के आनन्दरस से “रसो वै पयः” [श॰ ४.४.४.८] (मदिरः-न जागृविः) उपासक आनन्दवान् तथा सचेत सावधान विकासवान् हो जाता है (मधुश्चुतं कोशम्) तू मधु चुवाने वाले हृदयकोश को अभिप्राप्त हो जाता है।
Essence
हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! वाह रे तू मुमुक्षुजनों की तृप्ति के लिये आनन्दप्रपूर्ण है जैसे नद—महाजलाशय जल से भरा हुआ प्रपूर्ण होता है। तुझ सोमस्वरूप के रस से उपासक आनन्दवान् और सावधान प्रज्ञानवान् हो जाता है और उसके तू मधु चुआने वाले हृदयकोश को प्राप्त हो जाता है॥४॥
Special
ऋषिः—‘भरद्वाजः कश्यपः, गोतमः, अत्रिः, विश्वामित्रः, जमदग्निः, वसिष्ठः’ इति सप्तर्षयः (सम्पूर्ण खण्ड के ये भरद्वाज आदि सात ऋषि हैं, अर्थ पीछे आ चुके हैं)॥