Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 513

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ सो꣢म स्वा꣣नो꣡ अद्रि꣢꣯भिस्ति꣣रो꣡ वारा꣢꣯ण्य꣣व्य꣡या꣢ । ज꣢नो꣣ न꣢ पु꣣रि꣢ च꣣꣬म्वो꣢꣯र्विश꣣द्ध꣢रिः꣣ स꣢दो꣣ व꣡ने꣢षु दध्रिषे ॥५१३॥

आ । सो꣣म । स्वानः꣢ । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । तिरः꣢ । वा꣡रा꣢꣯णि । अ꣣व्य꣡या꣢ । ज꣡नः꣢꣯ । न । पु꣣रि꣢ । च꣣म्वोः꣢꣯ । वि꣣शत् । ह꣡रिः꣢꣯ । स꣡दः꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । द꣣ध्रिषे ॥५१३॥

Mantra without Swara
आ सोम स्वानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया । जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दध्रिषे ॥

आ । सोम । स्वानः । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । तिरः । वाराणि । अव्यया । जनः । न । पुरि । चम्वोः । विशत् । हरिः । सदः । वनेषु । दध्रिषे ॥५१३॥

Samveda - Mantra Number : 513
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अद्रिभिः) आदरणीय—सत्करणीय—सत्कार सेवित “तपसा, ब्रह्मचर्येण विद्यया श्रद्धया सेवितः सत्कारवान् भवति” [योग॰ १.१४ व्यासः] योगाभ्यासों के द्वारा (अव्यया वाराणि तिरः) अनिवार्य दोषवारण साधनों—यम नियम को मध्य में सेवित कर के (सोमः) शान्तस्वरूप परमात्मा (स्वानः) निष्पन्न—साक्षात् करणीय है, जो कि (हरिः) दुःखापहर्ता सुखाहर्ता (चम्वोः) द्यावापृथिवीमय द्युलोक से पृथिवीलोक पर्यन्त जगत् में “चम्वौ द्यावापृथिवीनाम्” [निघं॰ ३.३०] (आविशत्) समन्तरूप से प्रविष्ट है (जनः-न पुरि) जैसे जन जायमान प्राणी देहपुरी में आविष्ट होता है। वह तू (वनेषु सदः-दध्रिषे) वननीय मर्म स्थान में विशेषतः हृदयसदन को धारता है।
Essence
आदर सत्कार से तप ब्रह्मचर्य विद्या श्रद्धा से किए योगाभ्यासों के द्वारा और अनिवार्य दोषनिवारक अहिंसा आदि व्रतों को मध्य में करके शान्तस्वरूप परमात्मा निष्पन्न—साक्षात् किया हुआ जो कि दुःखापहर्ता सुखाहर्ता द्यावापृथिवीमय—द्युलोक से पृथिवीलोक पर्यन्त समस्त जगत् में ऐसे आविष्ट हो रहा है जैसे जन्यमान जीवात्मा देहपुरी में आविष्ट होता है। वह वननीय मर्म स्थलों हृदय आदि को अपना सदन बना रहा है॥३॥
Special
ऋषिः—‘भरद्वाजः कश्यपः, गोतमः, अत्रिः, विश्वामित्रः, जमदग्निः, वसिष्ठः’ इति सप्तर्षयः (सम्पूर्ण खण्ड के ये भरद्वाज आदि सात ऋषि हैं अर्थ पीछे आ चुके हैं)॥