Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 512

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣢री꣣तो꣡ षि꣢ञ्चता सु꣣त꣢꣫ꣳ सोमो꣣ य꣡ उ꣢त्त꣣म꣢ꣳ ह꣣विः꣢ । द꣣धन्वा꣡न् यो नर्यो꣢꣯ अ꣣प्स्वा꣢३꣱न्त꣢꣯रा सु꣣षा꣢व꣣ सो꣢म꣣म꣡द्रि꣢भिः ॥५१२॥

प꣡रि꣢꣯ । इ꣣तः꣢ । सि꣣ञ्चत । सुत꣢म् । सो꣡मः꣢꣯ । यः । उ꣣त्तम꣢म् । ह꣣विः꣢ । द꣣धन्वा꣢न् । यः । न꣡र्यः꣢꣯ । अ꣣प्सु꣢ । अ꣣न्तः꣢ । आ । सु꣣षा꣡व꣢ । सो꣡म꣢꣯म् । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः ॥५१२॥

Mantra without Swara
परीतो षिञ्चता सुतꣳ सोमो य उत्तमꣳ हविः । दधन्वान् यो नर्यो अप्स्वा३न्तरा सुषाव सोममद्रिभिः ॥

परि । इतः । सिञ्चत । सुतम् । सोमः । यः । उत्तमम् । हविः । दधन्वान् । यः । नर्यः । अप्सु । अन्तः । आ । सुषाव । सोमम् । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः ॥५१२॥

Samveda - Mantra Number : 512
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यः सोमः-उत्तमं हविः) जो शान्तस्वरूप परमात्मा अध्यात्मयज्ञ का उत्कृष्ट हवि है या उपासक के आत्मा का आत्मा है या प्राण समान आधार है “आत्मा वै हविः” [काठ॰ ८.५] “प्राणो हविः” [मै॰ १.९.१] (सुतम्) हृदय में इसे निष्पन्न साक्षात् किया करे (इतः) हृदय से (परिषिञ्चत) जीवन में सर्वत्र सींचो—आत्मसात् करो (अद्रिभिः) आदरणीय योगाभ्यासों के द्वारा “अद्रय आदरणीयाः” [निरु॰ ९.६] (अप्सु-अन्तरा) प्राणों के अन्दर (सोमं सुषाव) शान्तस्वरूप परमात्मा को निष्पन्न करता हूँ, साक्षात् करता हूँ (दधन्वान्) उसे परमात्मा अपने अन्दर धारण करता है (यः-नर्यः) जो नर—श्रेष्ठजन का हितकर है।
Essence
जो शान्तस्वरूप परमात्मा अध्यात्मयज्ञ का उत्कृष्ट हवि या उपासक के आत्मा का आत्मा या प्राण है उसे हृदय में साक्षात् कर हृदय से जीवन में सर्वत्र आत्मसात् करो, आदरणीय सत्कार से सेवनीय योगाभ्यासों के द्वारा प्राणों के अन्दर शान्तस्वरूप परमात्मा को जो साक्षात् करता है, उसे परमात्मा अपने अन्दर धारण करता है जो कि ऐसे श्रेष्ठ नर का हितकर है॥२॥
Special
ऋषिः—‘भरद्वाजः कश्यपः, गोतमः, अत्रिः, विश्वामित्रः, जमदग्निः, वसिष्ठः’ इति सप्तर्षयः (सम्पूर्ण खण्ड के ये भरद्वाज आदि सात ऋषि हैं। अर्थ पीछे आ चुके हैं)॥