Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 507

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣या꣡ सो꣢म सु꣣कृत्य꣡या꣢ म꣣हा꣢꣫न्त्सन्न꣣꣬भ्य꣢꣯वर्धथाः । म꣣न्दान꣡ इद्वृ꣢꣯षायसे ॥५०७॥

अ꣣या꣢ । सो꣣म । सुकृत्य꣡या꣢ । सु꣣ । कृत्य꣡या꣢ । म꣣हा꣢न् । सन् । अ꣣भि꣢ । अ꣣वर्धथाः । मन्दानः꣢ । इत् । वृ꣣षायसे ॥५०७॥

Mantra without Swara
अया सोम सुकृत्यया महान्त्सन्नभ्यवर्धथाः । मन्दान इद्वृषायसे ॥

अया । सोम । सुकृत्यया । सु । कृत्यया । महान् । सन् । अभि । अवर्धथाः । मन्दानः । इत् । वृषायसे ॥५०७॥

Samveda - Mantra Number : 507
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (महान् सन्) महान् होता हुआ (अया सुकृत्यया) इस उपासना से (अभ्यवर्धथाः) हमें बढ़ा (मन्दानः) स्तूयमान—अर्च्यमान हुआ “मदि स्तुति......” [भ्वादि॰] “मन्दते अर्चतिकर्मा” [निघं॰ ३.१४] ‘कर्मणि कर्तृप्रत्ययः’ (इत्) ही (वृषायसे) सुखवर्षक मेघ के समान हो जाता है।
Essence
हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! क्या कहना तू महान् होता हुआ हमारी इस स्तुति उपासना से हमें बढ़ाता है, हमारे द्वारा स्तुत किया जाता हुआ ही सुखवर्षक बन जाता है, धन्य हो आपकी आर्द्रता उदारता को॥११॥
Special
ऋषिः—कविः (क्रान्तदर्शी अध्यात्मवक्ता)॥