Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 505

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣षे꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या मृ꣣ज्य꣡मा꣢नो मनी꣣षि꣡भिः꣢ । इ꣡न्दो꣢ रु꣣चा꣡भि गा इ꣢꣯हि ॥५०५॥

इ꣣षे꣢ । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । मृ꣣ज्य꣡मा꣢नः । म꣣नीषि꣡भिः꣢ । इ꣡न्दो꣢꣯ । रु꣣चा꣢ । अ꣣भि꣢ । गाः । इ꣣हि ॥५०५॥

Mantra without Swara
इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभिः । इन्दो रुचाभि गा इहि ॥

इषे । पवस्व । धारया । मृज्यमानः । मनीषिभिः । इन्दो । रुचा । अभि । गाः । इहि ॥५०५॥

Samveda - Mantra Number : 505
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) हे आर्द्र भाव वाले रसीले सोम शान्तस्वरूप परमात्मन्! (मनीषिभिः) स्तुति उपासना करने वाले मेधावीजनों द्वारा “मनीषा मनस ईषया स्तुत्या प्रज्ञया वा” [निरु॰ ९.१०] “मनीषी मेधावी”—[निघं॰ ३.१५] (मृज्यमानः) प्राप्त होने में योग्य होता हुआ “मार्ष्टि गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] (इषे धारया पवस्व) इष्ट—परमसुख प्राप्ति के लिये ध्यानधारा द्वारा प्राप्त हो (रुचा) अमृत से (गाः-अभि) स्तुतियों वाणियों को लक्ष्य कर उनके साथ (इहि) प्राप्त हो।
Essence
हे आर्द्र रसीले शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू स्तुति करने वाले उपासकों द्वारा प्राप्त होने योग्य हमें इष्ट सुख प्राप्ति के लिये ध्यानधारणा से प्राप्त हो तथा अमृत धर्म से स्तुतियों के अनुरूप प्राप्त हों॥९॥
Special
ऋषिः—कश्यपः (द्रष्टा—परमात्मज्ञानी उपासक)॥