Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 502

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡नु꣢ प्र꣣त्ना꣡स꣢ आ꣣य꣡वः꣢ प꣣दं꣡ नवी꣢꣯यो अक्रमुः । रु꣣चे꣡ ज꣢नन्त꣣ सू꣡र्य꣢म् ॥५०२॥

अ꣡नु꣢꣯ । प्र꣣त्ना꣡सः꣢ । आ꣣य꣡वः꣢ । प꣣द꣢꣯म् । न꣡वी꣢꣯यः । अ꣣क्रमुः । रुचे꣢ । ज꣣नन्त । सू꣡र्य꣢꣯म् ॥५०२॥

Mantra without Swara
अनु प्रत्नास आयवः पदं नवीयो अक्रमुः । रुचे जनन्त सूर्यम् ॥

अनु । प्रत्नासः । आयवः । पदम् । नवीयः । अक्रमुः । रुचे । जनन्त । सूर्यम् ॥५०२॥

Samveda - Mantra Number : 502
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(प्रत्नासः-आयवः) देव—जीवन्मुक्त जन “देवा वै प्रत्नम्” [काठ॰ ७.४] “आयवः-मनुष्याः” [निघं॰ २.३] (रुचे) अमृतत्व के लिये “अमृतत्वं वै रुक्” [श॰ ९.४.२.१४] (सूर्यं जनन्त) सरणशील आनन्दधारा में प्रवहणशील सोम शान्त परमात्मा को अपने अन्दर जब साक्षात् करते हैं तब (नवीयः पदम्) अत्यन्त स्तुत्य पद मोक्ष को (अनु-अक्रमुः) अनुगत होते हैं—प्राप्त होते हैं।
Essence
देवजन—जीवन्मुक्त श्रेणी के महानुभाव अमृतत्व की प्राप्ति के लिये आनन्दधारा में प्राप्त होने वाले सोम—शान्त परमात्मा को साक्षात् करते ही अत्यन्त स्तुत्य मोक्षपद को प्राप्त होते हैं॥६॥
Special
ऋषिः—निध्रुविः (परमात्मा में नितान्त स्थिर रहने वाला उपासक)॥