Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 501

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡ण꣢ꣳ र꣣यि꣡ꣳ सो꣢म सु꣣वी꣡र्य꣢म् । अ꣣स्मे꣡ श्रवा꣢꣯ꣳसि धारय ॥५०१

आ꣢ । प꣣वस्व । सहस्रि꣡ण꣢म् । र꣣यि꣢म् । सो꣣म । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् । अ꣣स्मे꣡इति꣢ । श्र꣡वाँ꣢꣯सि । धा꣣रय ॥५०१॥

Mantra without Swara
आ पवस्व सहस्रिणꣳ रयिꣳ सोम सुवीर्यम् । अस्मे श्रवाꣳसि धारय ॥५०१

आ । पवस्व । सहस्रिणम् । रयिम् । सोम । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । अस्मेइति । श्रवाँसि । धारय ॥५०१॥

Samveda - Mantra Number : 501
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (सहस्रिणं सुवीर्यं रयिम्) परमपुरुषार्थ या परम स्थान या परमपद जिसके आश्रय में हो ऐसे “परमं सहस्रम्” [तां॰ १६.९.२] शोभन आत्मबल वाले मोक्षधन को (आपवस्व) समन्तरूप से प्रसारित कर—प्रदान कर (अस्मे) हमारे में (श्रवांसि धारय) इहलोक सिद्धि के लिये सब श्रवणीय यशस्वी—यशस्कर भोग और साधन धारण करा।
Essence
शान्तस्वरूप परमात्मन्! तेरी शरण में आने पर, तेरा उपासक बन जाने पर तू परमपद वाले शोभनबल एवं आत्मबल वाले मोक्षरूप अमृतधन को देता है और संसार में भी यशस्कर भोग एवं साधन प्रदान करता है॥५॥
Special
ऋषिः—निध्रुविः (परमात्मा में नितान्त स्थिर रहने वाला उपासक)॥