Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 499

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उचथ्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡ध्व꣢र्यो꣣ अ꣡द्रि꣢भिः सु꣣त꣡ꣳ सोमं꣢꣯ प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣡ न꣢य । पु꣣नाही꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे ॥४९९॥

अ꣡ध्व꣢꣯र्यो । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । सुत꣢म् । सो꣡म꣢꣯म् । प꣣वि꣡त्रे꣢ । आ । न꣣य । पुनाहि꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पा꣡त꣢꣯वे ॥४९९॥

Mantra without Swara
अध्वर्यो अद्रिभिः सुतꣳ सोमं पवित्र आ नय । पुनाहीन्द्राय पातवे ॥

अध्वर्यो । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । सुतम् । सोमम् । पवित्रे । आ । नय । पुनाहि । इन्द्राय । पातवे ॥४९९॥

Samveda - Mantra Number : 499
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अध्वर्यो) हे अध्यात्म यज्ञ के याजक! तू (अद्रिभिः सुतं सोमम्) श्लोककर्ता—स्तुति करने वालों के द्वारा “अद्रिरसि श्लोककृत्” [काठ॰ १.५] “श्लोकः—वाङ् नाम” [निघं॰ १.११] निष्पादित—भावित शान्त परमात्मा को (पवित्रे) प्राणापान स्थान हृदय में (आनय) ले आ—बिठा (इन्द्राय पातवे) वहाँ विराजमान हो आत्मा के पानार्थ (पुनाहि) तू अपने अन्दर प्रवाहित कर।
Essence
हे अध्यात्म यज्ञ के याजक प्रेरक महानुभाव तू स्तुतिकर्ता विद्वानों द्वारा निष्पादित—भावित शान्त परमात्मा को हृदय में बिठा वहाँ उपासक आत्मा को पान कराने के लिये प्रवाहित कर॥३॥
Special
ऋषिः—उचथ्यः (परमात्मा में समवेत होने वाला)॥