Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 484

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानो अजीजनद्दि꣣व꣢श्चि꣣त्रं꣡ न त꣢꣯न्य꣣तु꣢म् । ज्यो꣡ति꣢र्वैश्वान꣣रं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥४८४॥

प꣡व꣢꣯मानः । अ꣣जीजनत् । दिवः꣢ । चि꣣त्र꣢म् । न । त꣣न्यतु꣢म् । ज्यो꣡तिः꣢ । वै꣣श्वानर꣢म् । वै꣣श्व । नर꣢म् । बृ꣣ह꣢त् ॥४८४॥

Mantra without Swara
पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं न तन्यतुम् । ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत् ॥

पवमानः । अजीजनत् । दिवः । चित्रम् । न । तन्यतुम् । ज्योतिः । वैश्वानरम् । वैश्व । नरम् । बृहत् ॥४८४॥

Samveda - Mantra Number : 484
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पवमानः) आनन्दधारा में आते हुए शान्त परमात्मा ने (बृहत्-वैश्वानरं ज्योतिः) उपासक के अन्दर उसके महान् वैश्वानर आत्म-ज्योति को “आत्मा वैश्वानरः” [तै॰ स॰ ५.६.६.३] (अजीजनत्) प्रत्यक्ष कराया (दिवः) आकाश मण्डल के (चित्रं तन्यतुं न) अद्भुत वाणी का विस्तार करने वाली विद्युत् की भाँति को “तन्यतुस्तनित्री वाचः” [निरु॰ १२.३१]।
Essence
आनन्दधारा में आता हुआ शान्त परमात्मा उपासक के अन्दर उसकी आत्मज्योति को साक्षात् कराता है उसे अपने आत्मा का प्रत्यक्ष कराता है जैसे योगदर्शन में कहा है “तत श्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च” [योग॰ १.२९] मेघमण्डल की विचित्र विद्युत् ज्योति के समान॥८॥
Special
ऋषिः—अमहीयुः (पृथिवी का नहीं अपितु मोक्ष का इच्छुक)॥