Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 469

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
वृ꣡षा꣢ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या म꣣रु꣡त्व꣢ते च मत्स꣣रः꣡ । वि꣢श्वा꣣ द꣡धा꣢न꣣ ओ꣡ज꣢सा ॥४६९॥

वृ꣡षा꣢꣯ । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । म꣣रु꣡त्व꣢ते । च꣣ । मत्सरः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । द꣡धा꣢꣯नः । ओ꣡ज꣢꣯सा ॥४६९॥

Mantra without Swara
वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः । विश्वा दधान ओजसा ॥

वृषा । पवस्व । धारया । मरुत्वते । च । मत्सरः । विश्वा । दधानः । ओजसा ॥४६९॥

Samveda - Mantra Number : 469
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वृषा मत्सरः) हे सोम—शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू आनन्दवर्षक और हर्षालु हुआ (मरुत्वते च) प्राण वाले उपासक के लिये “प्राणो वै मरुतः” [ऐ॰ ३.१६] (धारया पवस्व) धारणा से प्राप्त हो (ओजसा विश्वा दधानः) अपने ओज से, प्रताप से सब दिव्यगुणों और सुखों को धारण कराता हुआ आ।
Essence
आनन्द और हर्ष की वृष्टि करने वाला शान्तस्वरूप परमात्मा प्राणवान् उपासक के लिये आनन्दधारा में आता है तथा उपासक के अन्दर अपने प्रताप से आनन्दित कर देता है॥३॥
Special
ऋषिः—भृगुर्वारुणिः (वरणव्यवहार कुशल तेजस्वी उपासक)॥