Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 467

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣च्चा꣡ ते꣢ जा꣣त꣡मन्ध꣢꣯सो दि꣣वि꣡ सद्भूम्या द꣢꣯दे । उ꣣ग्र꣢꣫ शर्म꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥४६७॥

उ꣣च्चा꣢ । उ꣣त् । चा꣢ । ते꣣ । जात꣢म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । दि꣣वि꣢ । सत् । भू꣡मि꣢꣯ । आ । द꣣दे । उग्र꣢म् । श꣡र्म꣢ । म꣡हि꣢꣯ । श्र꣡वः꣢꣯ ॥४६७॥

Mantra without Swara
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे । उग्र शर्म महि श्रवः ॥

उच्चा । उत् । चा । ते । जातम् । अन्धसः । दिवि । सत् । भूमि । आ । ददे । उग्रम् । शर्म । महि । श्रवः ॥४६७॥

Samveda - Mantra Number : 467
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(ते-अन्धसः) तुझ आध्यानीय—उपासनीय पवमान सोम—आनन्दधारा में आते हुए शान्त परमात्मा का (जातम्) प्रसिद्धरूप (उच्चा) ऊँचा—उत्कृष्ट है, जो (दिवि सत्) अमृत मोक्षधाम में होते हुए को “त्रिपादस्यामृतं दिवि” [ऋ॰ १०.९०.३] (भूमि-आददे) भूमि—पृथिवी पर जन्मा हुआ पार्थिव शरीर में आया हुआ “ताद्धितेन कृत्स्नवन्निगमा भवन्ति” [निरु॰ २.५] “सुपां सुलुक्.....” [अष्टा॰ ७.३.३९] ‘सप्तम्याश्च लुक्’ मैं शरीरबन्धन से मुक्त हो मोक्षधाम में पहुँच कर ग्रहण करता हूँ प्राप्त कर लेता हूँ (उग्रं शर्म महि श्रवः) जो कि उच्च सुख बहुत प्रशंसनीय है।
Essence
मोक्ष में परमात्मा का ऊँचा स्वरूप साक्षात् होने वाला है। उसकी आकांक्षा उपासक में होनी चाहिए, उपासक की प्रवृत्ति या रुचि पृथिवीलोक के भोगों में नहीं रहती वह तो ऊँचे सुख और प्रशंसनीय दर्शनामृत की चाह रखता है॥१॥
Special
ऋषिः—अमहीयुः (पृथिवी को नहीं अपितु मोक्षधाम को चाहने वाला उपासक जन)॥ देवताः—पवमानः सोमः (आनन्दधारा में प्राप्त होने वाला परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥