Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 46

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
शे꣢षे꣣ वने꣡षु꣢ मा꣣तृ꣢षु꣣ सं꣢ त्वा꣣ म꣡र्ता꣢स इन्धते । अ꣡त꣢न्द्रो ह꣣व्यं꣡ व꣢हसि हवि꣣ष्कृ꣢त꣣ आ꣢꣫दिद्दे꣣वे꣡षु꣢ राजसि ॥४६॥

शे꣡षे꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । मा꣣तृ꣡षु꣢ । सम् । त्वा꣣ । म꣡र्ता꣢꣯सः । इ꣣न्धते । अ꣡त꣢꣯न्द्रः । अ । त꣣न्द्रः । ह꣣व्यम् । व꣣हसि । हविष्कृ꣡तः꣢ । ह꣣विः । कृ꣡तः꣢꣯ । आत् । इत् । दे꣣वे꣡षु꣢ । रा꣣जसि ॥४६॥

Mantra without Swara
शेषे वनेषु मातृषु सं त्वा मर्तास इन्धते । अतन्द्रो हव्यं वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि ॥

शेषे । वनेषु । मातृषु । सम् । त्वा । मर्तासः । इन्धते । अतन्द्रः । अ । तन्द्रः । हव्यम् । वहसि । हविष्कृतः । हविः । कृतः । आत् । इत् । देवेषु । राजसि ॥४६॥

Samveda - Mantra Number : 46
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वनेषु मातृषु शेषे) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! तू रश्मियों “वनं रश्मिनाम” [निघं॰ १.५] मानव मस्तिष्क के ज्ञानतन्तुरसों में “यः कपाले रसो लिप्त आसीत् ते रश्मयोऽभवन्” [श॰ ६.१.२.६] एवं शरीर की नाड़ियों में “मातरः-नद्यः” [निघं॰ १.१३] “सीराः-नद्यः” [निघं॰ १.१३] “सीराः-नाड्यः सीरा युञ्जन्ति कवयो॰...” [यजु॰ १२.६७] निहित रहता है (त्वां मर्तासः समिन्धते) तुझे मनुष्य प्रदीप्त करते हैं—साक्षात् करते हैं (अतन्द्रः) तू तन्द्रारहित-सावधान-अनन्त ज्ञानवान् (हविष्कृतः-हव्यं वहसि) आत्मसमर्पी की हावभाव भरी स्तुतिरूप भेंट को वहन करता है—स्वीकार करता है (आत्-इत्) इसके अनन्तर ही (देवेषु राजसि) तू उस आत्मसमर्पी मर्त्य—मरणधर्मीजन को मुक्तात्माओं में विराजमान कर देता है “राजयसि-राजसि-अन्तर्गतणिजर्थः”।
Essence
परमात्मन्! तू मानव मस्तिष्क के ज्ञान तन्तुओं और शरीर की प्राणनाडियों में अदृश्य रूप में वर्तमान है, तुझे उपासक अपनी स्तुतियों से वैराग्यपूर्वक मन में बिठाता है और मस्तिष्क तन्तुओं में प्राणनाड़ियों में अभ्यास से सिद्ध कर हृदय में साक्षात् करता है। ऐसे उपासक को परमात्मन् तू मुक्तात्माओं में पहुँचा देता है। अपना अमृतानन्द पुरस्कार प्रदान करता है॥२॥
Special
ऋषिः—भर्गः (ज्ञानमय तेज वाला उपासक)॥