Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 454

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- द्विपदा त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣या꣡ वाजं꣢꣯ दे꣣व꣡हि꣢तꣳ सनेम꣣ म꣡दे꣢म श꣣त꣡हि꣢माः सु꣣वी꣡राः꣢ ॥४५४॥

अ꣣या꣢ । वा꣡ज꣢꣯म् । दे꣣व꣡हि꣢तम् । दे꣣व꣢ । हि꣣तम् । सनेम । म꣡दे꣢꣯म । श꣣त꣡हि꣢माः । श꣣त꣢ । हि꣣माः । सुवी꣡राः꣢ । सु꣣ । वी꣡राः꣢꣯ ॥४५४॥

Mantra without Swara
अया वाजं देवहितꣳ सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः ॥

अया । वाजम् । देवहितम् । देव । हितम् । सनेम । मदेम । शतहिमाः । शत । हिमाः । सुवीराः । सु । वीराः ॥४५४॥

Samveda - Mantra Number : 454
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अया) इस स्तुति से (देवहितं वाजं सनेम) मुमुक्षुजनों के हितकर अमृतान्नभोग को हम सेवन करें “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै॰ २.१९३] (सुवीराः शतहिमाः-मदेम) अच्छे प्राणों वाले “प्राणा वै दश वीराः” [श॰ १२.८.१.३२] सौ हेमन्त ऋतु तक हर्षित रहें।
Essence
श्रद्धापूर्वक परमात्मा की स्तुति द्वारा मुमुक्षुओं के हितकर अमृतभोग को सेवन करें और सौ वर्षों तक अच्छे पुष्ट प्राणों वाले होते हुए हर्षित रहें॥८॥
Special
ऋषिः—भरद्वाजः (अमृत अन्नभोग को अपने लिए भरण करने वाला उपासक)॥