Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 453

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- कवष ऐलूषः Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वि꣢ स्रु꣣त꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थ꣢꣫ इन्द्र꣣ त्व꣡द्य꣢न्तु रा꣣त꣡यः꣢ ॥४५३॥

वि꣢ । स्रु꣣त꣡यः꣢ । य꣡था꣢꣯ । प꣣थः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वत् । य꣣न्तु । रात꣡यः꣢ ॥४५३॥

Mantra without Swara
वि स्रुतयो यथा पथ इन्द्र त्वद्यन्तु रातयः ॥

वि । स्रुतयः । यथा । पथः । इन्द्र । त्वत् । यन्तु । रातयः ॥४५३॥

Samveda - Mantra Number : 453
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! (यथा) जैसे (विस्रुतयः) विविध स्रवण करनेवाली नदियाँ अपने अपने मार्ग से पृथिवी को सींचती हैं, ऐसे ही (त्वत्) तुझसे (रातयः) तेरी दानधाराएँ हमें (यन्तु) प्राप्त हों।
Essence
परमात्मन्! इसमें सन्देह नहीं जब हम तेरे उपासक बन जाते हैं तो हम उपासकों की ओर तेरी दानधाराएँ ऐसे प्राप्त होती हैं जैसे मार्ग से बहती हुई विविध जलधाराएँ पृथिवी पर प्राप्त होती हैं॥७॥
Special
ऋषिः—कवष ऐलूषः (उदक—जल को बान्धने वाला पृथिवी पर वास कराने—वसाने वाला शरीर के जीवनरस और प्राणों पर अधिकार कर देहपुरी में वसने वाला उपासक जन)॥