Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 450

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गोपायना लौपायना वा Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वि꣡श्व꣢स्य꣣ प्र꣡ स्तो꣢भ पु꣣रो꣢ वा꣣ स꣡न्यदि꣢꣯ वे꣣ह꣢ नू꣣न꣢म् ॥४५०

वि꣡श्व꣢꣯स्य । प्र । स्तो꣢भ । पुरः꣢ । वा꣣ । स꣢न् । य꣡दि꣢꣯ । वा꣣ । इह꣢ । नू꣣न꣢म् ॥४५०॥

Mantra without Swara
विश्वस्य प्र स्तोभ पुरो वा सन्यदि वेह नूनम् ॥४५०

विश्वस्य । प्र । स्तोभ । पुरः । वा । सन् । यदि । वा । इह । नूनम् ॥४५०॥

Samveda - Mantra Number : 450
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विश्वस्य प्रस्तोभ) हे विश्व के स्तम्भक—सम्भालने वाले परमात्मन्! “ष्टुभु स्तम्भने” [भ्वादि॰] “प्र पूर्वकात् ष्टुभधातोः-अच् प्रत्ययः कर्तरि” (पुरः-वा) तू विश्व—जगत् से पूर्व भी था ‘वा समुच्चयार्थे’ (यदि वा नूनम्-इह सन्) ‘यदि च’ यद्यपि इस जगत् में निश्चिय वर्तमान है।
Essence
हे विश्व के स्तम्भक—सम्भालने वाले परमात्मन्! जबकि वर्तमान जगत् में तू निश्चित स्थिर है—अमर है तो इस जगत् से पूर्व भी तो तू था, तू नित्य निरन्तर अजर अमर है॥४॥
Special
ऋषिः—बन्धुः सुबन्धुर्विप्रबन्धुश्च (परमात्मा के स्नेह में बन्धा अच्छा बन्धा, विशेष गाढ बँधा हुआ उपासक)॥