Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 449

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गोपायना लौपायना वा Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
भ꣢गो꣣ न꣢ चि꣣त्रो꣢ अ꣣ग्नि꣢र्म꣣हो꣢नां꣣ द꣡धा꣢ति꣣ र꣡त्न꣢म् ॥४४९

भ꣣गः꣢꣯ । न । चि꣣त्रः꣢ । अ꣣ग्निः꣢ । म꣣हो꣡ना꣢म् । द꣡धा꣢꣯ति । र꣡त्न꣢꣯म् ॥४४९॥

Mantra without Swara
भगो न चित्रो अग्निर्महोनां दधाति रत्नम् ॥४४९

भगः । न । चित्रः । अग्निः । महोनाम् । दधाति । रत्नम् ॥४४९॥

Samveda - Mantra Number : 449
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा (भगः-न चित्रः) सूर्य के समान चित्र—चायनीय—दर्शनीय—आत्मा में साक्षात् होने योग्य है “भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता” [ऋ॰ ७.४१.२] (महोनां रत्नं दधाति) महनीय—प्रशंसनीय जनों—मुमुक्षुओं के लिये रमणीय अध्यात्म सुखों को धारण करता है।
Essence
परमात्मा मुमुक्षुजनों के हृदय में सूर्य समान साक्षात् दर्शनीय होकर रमणीय सुखों को धारण करता है॥३॥
Special
ऋषिः—बन्धुः सुबन्धुर्विप्रबन्धुश्च (परमात्मा के स्नेह में बन्धा अच्छा बन्धा, विशेष गाढ बँधा हुआ उपासक)॥ छन्दः—पञ्चदशाक्षरा गायत्री॥