Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 447

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- पृषध्रः काण्वः Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡चे꣢त्य꣣ग्नि꣡श्चिकि꣢꣯तिर्हव्य꣣वाड्न꣢꣫ सु꣣म꣡द्र꣢थः ॥४४७॥

अ꣡चे꣢꣯ति । अ꣣ग्निः꣢ । चि꣡कि꣢꣯तिः । ह꣣व्यवा꣡ट् । ह꣣व्य । वा꣢ट् । न । सु꣣म꣡द्र꣢थः । सु꣣म꣢त् । र꣣थः ॥४४७॥

Mantra without Swara
अचेत्यग्निश्चिकितिर्हव्यवाड्न सुमद्रथः ॥

अचेति । अग्निः । चिकितिः । हव्यवाट् । हव्य । वाट् । न । सुमद्रथः । सुमत् । रथः ॥४४७॥

Samveda - Mantra Number : 447
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(चिकितिः) ज्ञानवान् (हव्याड्-न) हव्य वहन करने वाली भौतिक अग्नि की भान्ति (समुद्रथः) स्वयं रथरूप—अपने में रममाण करने वाला “सुमत् स्वयमित्यर्थः” [निरु॰ ६.२२] (अग्निः) ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा (अचेति) उपासकों के हृदय में चेतता है—साक्षात् होता है।
Essence
ज्ञानवान् सर्वज्ञ स्वयं में रमण करने वाला प्रकाशस्वरूप परमात्मा हव्यवहनकर्ता भौतिक अग्नि की भाँति उपासकों के हृदय में साक्षात् होता है॥१॥
Special
ऋषिः—सम्पातः (परमात्मा से मेल करने वाला उपासक)॥ देवताः—अग्निः (ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा)॥