Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 446

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य वृत्र꣣ह꣡न्त꣢माय꣣ वि꣡प्रा꣢य गा꣣थं꣡ गा꣢यत꣣ यं꣢ जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥४४६॥

प्र꣢ । वः꣣ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । वृ꣣त्रह꣡न्त꣢माय । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯माय । वि꣡प्रा꣢꣯य । वि । प्रा꣣य । गाथ꣢म् । गा꣣यत । य꣢म् । जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥४४६॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषते ॥

प्र । वः । इन्द्राय । वृत्रहन्तमाय । वृत्र । हन्तमाय । विप्राय । वि । प्राय । गाथम् । गायत । यम् । जुजोषते ॥४४६॥

Samveda - Mantra Number : 446
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वः) ‘यूयम्-विभक्तिव्यत्ययः’ हे मरुतो—मुमुक्षुजनो! तुम (वृत्रहन्तमाय) अत्यन्त पापनाशक—(विप्राय) प्रजापति—प्रजापालक—“प्रजापतिर्वै विप्रः” [श॰ ६.१.१.१६] (इन्द्राय) परमात्मा के लिये (गाथं प्रगायत) गान करने योग्य भजन कीर्तन स्तवन को भली प्रकार गाओ (यं जुजोषते) जिसको वह प्रसन्न—पसन्द करता है।
Essence
मुमुक्षुजनों आत्मयाजी लोगों को अत्यन्त पापनाशक प्रजापालक परमात्मा के लिये गाने योग्य भजन कीर्तन स्तवन इस प्रकार करना चाहिए, जिससे वह परमात्मा प्रसन्न होता है॥१०॥
Special
ऋषिः—सम्पातः (परमात्मा से मेल करने वाला उपासक)॥