Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 441

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
शं꣢ प꣣दं꣢ म꣣घ꣡ꣳ र꣢यी꣣षि꣢णे꣣ न꣡ काम꣢꣯मव्र꣢तो꣡ हि꣢नोति꣣ न꣡ स्पृ꣢शद्र꣣यि꣢म् ॥४४१

श꣢म् । प꣣द꣢म् । म꣣घ꣢म् । र꣣यीषि꣡णे꣢ । न । का꣡म꣢꣯म् । अ꣣व्रतः꣢ । अ꣣ । व्रतः꣢ । हि꣣नोति । न꣢ । स्पृ꣣शत् । रयि꣢म् ॥४४१॥

Mantra without Swara
शं पदं मघꣳ रयीषिणे न काममव्रतो हिनोति न स्पृशद्रयिम् ॥४४१

शम् । पदम् । मघम् । रयीषिणे । न । कामम् । अव्रतः । अ । व्रतः । हिनोति । न । स्पृशत् । रयिम् ॥४४१॥

Samveda - Mantra Number : 441
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(रयीषिणे) उपासना द्वारा वैश्वानर—परमात्मा को चाहने वाले या प्राप्त होने वाले के लिए “एष वै रयिर्वैश्वानरः” [श॰ १०.६.१.५] (शं पदं मघम्) कल्याणकर पद और कल्याणकर धन—मोक्ष सुख है “मघं धननाम” [निघं॰ २.१०] (अव्रतः) व्रतहीन—सत्यसङ्कल्पहीन जन ( कामं न हिनोति) अभीष्ट परमात्मा को नहीं प्राप्त करता है “हिन्वन्ति-आप्नुवन्ति” [निरु॰ १.२०] (रयिं न स्पृशत्) उस परमात्मा को वह छू भी नहीं सकता है।
Essence
उपासना द्वारा परमात्मा को चाहने वाले या प्राप्त होने वाले के लिये शान्त कल्याणकर मोक्षपद और कल्याणकर मोक्षधन हैं। किन्तु सत्यसङ्कल्प आदि से रहित के लिये कभी नहीं हैं, वह तो स्पर्श भी नहीं कर सकता है॥५॥
Special
ऋषिः—त्रसदस्युः (निज उद्वेग—अशान्ति को क्षीण करने वाला उपासक)॥ देवताः—इन्द्र (ऐश्वर्यवान् परमात्मा)॥