Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 439

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ब्र꣣ह्मा꣢ण꣣ इ꣡न्द्रं꣢ म꣣ह꣡य꣢न्तो अ꣣र्कै꣡र꣢꣯वर्धय꣣न्न꣡ह꣢ये꣣ ह꣢न्त꣣वा꣡ उ꣢ ॥४३९॥

ब्र꣣ह्मा꣡णः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । म꣣ह꣡य꣢न्तः । अ꣣र्कैः꣢ । अ꣡व꣢꣯र्धयन् । अ꣡ह꣢꣯ये । हन्त꣣वै꣢ । उ꣣ ॥४३९॥

Mantra without Swara
ब्रह्माण इन्द्रं महयन्तो अर्कैरवर्धयन्नहये हन्तवा उ ॥

ब्रह्माणः । इन्द्रम् । महयन्तः । अर्कैः । अवर्धयन् । अहये । हन्तवै । उ ॥४३९॥

Samveda - Mantra Number : 439
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(ब्रह्माणः) ब्रह्मविद्या में कुशल विद्वान् (इन्द्रम्) ऐश्वर्यवान् परमात्मा को (महयन्तः) पूजन करने के हेतु (अर्कैः) अर्चनमन्त्रों से (अवर्धयन्) बढ़ाता है अपने अन्दर प्रवृद्ध करता है (अहिं हन्तवैः-उ) पापभाव को हनन करने के लिए।
Essence
ब्रह्म को जानने वाले जन ऐश्वर्यवान् परमात्मा की अर्चना करने के हेतु हम अर्चनामन्त्रों से अपने अन्दर बढ़ बढ़कर साक्षात् करने वाले हैं, अपने अन्दर पाप का हनन करने के लिये नहीं॥३॥
Special
ऋषिः—त्रसदस्युः (निज उद्वेग—अशान्ति का क्षीण करने वाला उपासक)॥ देवताः—इन्द्र (ऐश्वर्यवान् परमात्मा)॥