Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 433

1875 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣢ ईं꣣꣬ व्य꣢꣯क्ता꣣ न꣢रः꣣ स꣡नी꣢डा रु꣣द्र꣢स्य꣣ म꣢र्या꣣ अ꣢था꣣ स्व꣡श्वाः꣢ ॥४३३॥

के꣢ । ई꣣म् । व्य꣡क्ता꣢ । वि । अ꣣क्ताः । न꣡रः꣢꣯ । स꣡नी꣢꣯डाः । स । नी꣣डाः । रुद्र꣡स्य꣢ । म꣡र्याः꣢꣯ । अ꣡थ꣢꣯ । स्वश्वाः꣢꣯ । सु꣣ । अ꣡श्वाः꣢꣯ ॥४३३॥

Mantra without Swara
क ईं व्यक्ता नरः सनीडा रुद्रस्य मर्या अथा स्वश्वाः ॥

के । ईम् । व्यक्ता । वि । अक्ताः । नरः । सनीडाः । स । नीडाः । रुद्रस्य । मर्याः । अथ । स्वश्वाः । सु । अश्वाः ॥४३३॥

Samveda - Mantra Number : 433
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(रुद्रस्य) विश्व में पूर्ण पुरुष परमात्मा के “रुद्रो वै पुरुषः” [जै॰ ३।११३] (मर्य्याः) मनुष्य हितकारी (अथ) तथा (स्वश्वाः) सुष्ठु संयत इन्द्रिय घोड़े जिनसे हो जाते हैं ऐसे (सनीडाः) समानस्थान वाले (व्यक्ताः) भासित—भासमान (नरः) नायक सञ्चालक (के-ईम्) कौन ही हैं? सुखप्रद हैं।
Essence
परमात्मा के व्यापन धर्म मनुष्यों के हितकर बन्धन वासनाओं को मारने वाले इन्द्रियों में संयमशक्ति देने वाले परस्पर एकाङ्ग एकक्रम में रहने वाले चलने वाले मोक्ष की ओर ले जाने वाले विश्व में या अन्तःकरण में भासमान कुछ या सुख देने वाले व्यापन-धर्म हैं॥७॥
Special
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाला)॥ देवता—मरुतः (वासनामारक परमात्मा के व्याप्त गुण धर्म)॥ छन्दः—द्विपदा पंक्तिः॥