Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 432

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- त्रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामध्या Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢नु꣣ हि꣡ त्वा꣢ सु꣣त꣡ꣳ सो꣢म꣣ म꣡दा꣢मसि म꣣हे꣡ स꣢मर्य꣣रा꣡ज्ये꣢ । वा꣡जा꣢ꣳ अ꣣भि꣡ प꣢वमान꣣ प्र꣡ गा꣢हसे ॥४३२॥

अ꣡नु꣢꣯ । हि । त्वा꣣ । सुत꣢म् । सो꣣म । म꣡दा꣢꣯मसि । म꣣हे꣢ । स꣣मर्यरा꣡ज्ये꣢ । स꣣मर्य । रा꣡ज्ये꣢꣯ । वा꣡जा꣢꣯न् । अ꣣भि꣢ । प꣣वमान । प्र꣢ । गा꣣हसे ॥४३२॥

Mantra without Swara
अनु हि त्वा सुतꣳ सोम मदामसि महे समर्यराज्ये । वाजाꣳ अभि पवमान प्र गाहसे ॥

अनु । हि । त्वा । सुतम् । सोम । मदामसि । महे । समर्यराज्ये । समर्य । राज्ये । वाजान् । अभि । पवमान । प्र । गाहसे ॥४३२॥

Samveda - Mantra Number : 432
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे उपासनारस! (त्वा-सुतम्-अनु हि) तेरे निष्पन्न सेवन के साथ ही (सम्मदामसि) हम सम्यक् तृप्त होते हैं (महे-अर्यराज्ये) बड़े स्वामी परमात्मा के राज्य में—मोक्ष में (पवमान) हे पवित्रकारक! (वाजान्) अपने हर्ष बलों को (अभि) लक्षित कर (प्रगाहसे) प्रगति कर रहा है।
Essence
हे उपासनारस तुझ निष्पन्न के साथ हम सम्यक् तृप्त हों और महान् परम राज्य के निमित्त मोक्षार्थ प्रगति करें॥६॥
Special
ऋषिः—ऋणत्रसदस्यू ऋषी (ऋणत्रास को क्षीण करने वाले जप और स्वाध्यायकर्ता)॥ देवता—पवमानः सोमः (आनन्दप्रद उपासनारस)॥ छन्दः—द्विपदा अनुष्टुप् पिपीलिकामध्या॥