Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 429

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हा꣡न्त्स꣢मु꣣द्रः꣢ पि꣣ता꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ वि꣢श्वा꣣भि꣡ धाम꣢꣯ ॥४२९॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । महा꣢न् । स꣣मुद्रः꣢ । स꣣म् । उद्रः꣢ । पि꣣ता꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । धा꣡म꣢꣯ ॥४२९॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम महान्त्समुद्रः पिता देवानां विश्वाभि धाम ॥

पवस्व । सोम । महान् । समुद्रः । सम् । उद्रः । पिता । देवानाम् । विश्वा । अभि । धाम ॥४२९॥

Samveda - Mantra Number : 429
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे मेरे उपासनारस! तू (महान्-समुद्रः) महान् समुन्दनशील हुआ (देवानां पिता) मेरी इन्द्रियों का पालक-अन्यथा विषयों में जाने से बचाने वाला (विश्वा धामअभि) मेरे समस्त जीवनकेन्द्रों के प्रति (पवस्व) चालू रह।
Essence
उपासनारस महान् तरावट करने वाला हो। समस्त इन्द्रियों को अन्यथा चेष्टा से बचाने वाला समस्त जीवनकेन्द्रों में पहुँचकर जीवन और शान्ति देने वाला है॥३॥
Special
ऋषिः—ऋणत्रसदस्यू ऋषी (ऋणत्रास को क्षीण करने वाले जप और स्वाध्यायकर्ता)॥ देवता—पवमानः सोमः (आनन्दप्रद उपासनारस)॥ छन्दः—द्विपदा पंक्ति॥