Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 428

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- त्रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामध्या Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣢र्यू꣣ षु꣡ प्र ध꣢꣯न्व꣣ वा꣡ज꣢सातये꣣ प꣡रि꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ स꣣क्ष꣡णिः꣢ । द्वि꣣ष꣢स्त꣣र꣡ध्या꣢ ऋण꣣या꣡ न꣢ ईरसे ॥४२८॥

प꣡रि꣢꣯ । उ꣣ । सु꣢ । प्र । ध꣣न्व । वा꣡ज꣢꣯सातये । वा꣡ज꣢꣯ । सा꣣तये । प꣡रि꣢꣯ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । स꣣क्ष꣡णिः꣢ । स꣣ । क्ष꣡णिः꣢꣯ । द्वि꣣षः꣢ । त꣣र꣡ध्यै꣢ । ऋ꣣णयाः꣢ । ऋ꣣ण । याः꣢ । नः꣢ । ईरसे ॥४२८॥

Mantra without Swara
पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः । द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे ॥

परि । उ । सु । प्र । धन्व । वाजसातये । वाज । सातये । परि । वृत्राणि । सक्षणिः । स । क्षणिः । द्विषः । तरध्यै । ऋणयाः । ऋण । याः । नः । ईरसे ॥४२८॥

Samveda - Mantra Number : 428
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
हे मेरे उपासनारस तू (वाजसातये) अमृत—अन्नभोग—प्राप्ति के लिये (उ सु) अवश्य सुन्दररूप में (परिप्रधन्व) परिपूर्ण प्रगति कर (सक्षणिः) तू सहनशील हुआ (वृत्राणि परि) पापभावों को परे कर (द्विषः-तरध्यै) द्वेषभावनाओं-विरोधी विचारों के पार करने को (ऋणयाः-नः-ईरसे) ऋणभार ले जाने, वहन करने, चुकाने वाला तू हमें प्रेरित करता है।
Essence
उपासनारस अमृतभोग प्राप्ति के लिये भली-भाँति प्रगति करता है शान्तरूप सहनशील समस्त पापभावों को परे करता है द्वेष प्रवृत्तियों को तरने, पार करने के लिए ऊपर भाररूप ऋण अन्यों के द्वारा उपकारों को चुकानेवाला बन, हमें प्रेरित करता है॥२॥
Special
ऋषिः—ऋणत्रसदस्यू ऋषी (ऋणत्रास को क्षीण करने वाले जप और स्वाध्यायकर्ता)॥ देवता—पवमानः सोमः (आनन्दप्रद उपासनारस)॥ छन्दः—त्रिपदा अनुष्टुप्, पिपीलिकामध्या॥