Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 422

1875 Mantra
Devata- सोमः Rishi- विमद ऐन्द्रः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
भ꣣द्रं꣢ नो꣣ अ꣡पि꣢ वातय꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣡ क्रतु꣢꣯म् । अ꣡था꣢ ते स꣣ख्ये꣡ अन्ध꣢꣯सो꣣ वि꣢ वो꣣ म꣢दे꣣ र꣢णा꣣ गा꣢वो꣣ न꣡ यव꣢꣯से꣣ वि꣡व꣢क्षसे ॥४२२॥

भ꣣द्र꣢म् । नः꣣ । अ꣡पि꣢꣯ । वा꣣तय । म꣡नः꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । क्र꣡तु꣢꣯म् । अ꣡थ꣢꣯ । ते꣣ । सख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । वि । वः꣣ । म꣡दे꣢꣯ । र꣡ण꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । न । य꣡व꣢꣯से । वि꣡व꣢꣯क्षसे ॥४२२॥

Mantra without Swara
भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम् । अथा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे रणा गावो न यवसे विवक्षसे ॥

भद्रम् । नः । अपि । वातय । मनः । दक्षम् । उत । क्रतुम् । अथ । ते । सख्ये । स । ख्ये । अन्धसः । वि । वः । मदे । रण । गावः । न । यवसे । विवक्षसे ॥४२२॥

Samveda - Mantra Number : 422
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
सोम परमात्मन्! (नः) हमारे (मनः) मन को (दक्षम्) आत्मबल को “दक्षो बलम्” [निघं॰ २.९] (उत) ‘अपि’—और (क्रतुम्) प्रज्ञा को “क्रतुः प्रज्ञानाम” [निघं॰ ३.९] (भद्रम्-अपि वातय) भद्र—भद्ररूप में अवश्य चला “अपि निश्चये” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] (अथ) हाँ (ते-अन्धसः सख्ये) तुझ आध्यानीय—समन्त ध्यातव्य सोम परमात्मा के सखिभाव—मित्रभाव में तथा (मदे) हर्ष में (विवः) विकसित होऊँ—हर्षाऊँ (रण-गावः-न यवसे) जैसे घास के लिये गौव्वें रमण करतीं—प्रसन्न होती हैं ऐसे (विवक्षसे) महत्त्व को प्राप्त होता है।
Essence
हे शान्तरूप परमात्मन्! तू महत्त्व को पा रहा है, अतः तू हमारे मनोबल—आत्मबल को और प्रज्ञा को निश्चित भद्र—कल्याणरूप कर दें तुझ ध्यान में आने योग्य के मित्रभाव में और हर्ष में हम विकसित हों, गौव्वें जैसे घास के लिए हर्षित होती हैं॥४॥
Footnote
[*32. “सोमो वै देवानां जनिता” [जै॰ ३.१७४]।]
Special
ऋषिः—विमदः (परमात्मा में विशेष हर्ष को प्राप्त उपासक)॥ देवता—सोमः (शान्त आनन्दस्वरूप परमात्मा*32)॥