Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 419

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ ते꣢ अग्न इधीमहि द्यु꣣म꣡न्तं꣢ देवा꣣ज꣡र꣢म् । यु꣢द्ध꣣ स्या꣢ ते꣣ प꣡नी꣢यसी स꣣मि꣢द्दी꣣द꣡य꣢ति꣣ द्य꣡वी꣢꣯षꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥४१९॥

आ꣢ । ते꣣ । अग्ने । इधीमहि । द्युम꣡न्त꣢म् । दे꣣व । अज꣡र꣢म् । अ । ꣣ज꣡र꣢꣯म् । यत् । ह꣣ । स्या꣢ । ते꣣ । प꣡नी꣢꣯यसी । स꣣मि꣢त् । स꣣म् । इ꣢त् । दी꣣द꣡य꣢ति । द्य꣡वि꣢꣯ । इ꣡ष꣢꣯म् । स्तो꣣तृ꣡भ्यः꣢ । आ । भ꣣र ॥४१९॥

Mantra without Swara
आ ते अग्न इधीमहि द्युमन्तं देवाजरम् । युद्ध स्या ते पनीयसी समिद्दीदयति द्यवीषꣳ स्तोतृभ्य आ भर ॥

आ । ते । अग्ने । इधीमहि । द्युमन्तम् । देव । अजरम् । अ । जरम् । यत् । ह । स्या । ते । पनीयसी । समित् । सम् । इत् । दीदयति । द्यवि । इषम् । स्तोतृभ्यः । आ । भर ॥४१९॥

Samveda - Mantra Number : 419
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने देव) परमात्मदेव! (ते) ‘त्वाम्’ तुझ (द्युमन्तम्) प्रकाशमान (अजरम्) अजर—जरारहित को (आ-इधीमहि) अपने अन्दर प्रदीप्त करते हैं (ते) तेरी (यत्-ह) जो ही (स्या पनीयसी समित्) वह अत्यन्त प्रशंसनीय दीप्ति (द्यवि दीदयति) द्युमण्डल में—अमृत मोक्षधाम में प्रदीप्त हो रही है “त्रिपादस्यामृतं दिवि” [ऋ॰ १०.९०.३] उस मोक्षधाम का (इषम्) अमृतभोग (स्तोतृभ्यः-आभर) उपासकों के लिए आभरित कर—यहाँ इस लोक में मेरे हृदय में भर दे।
Essence
अजर प्रकाशमान परमात्मदेव को अपने हृदय में ध्यान द्वारा प्रकाशित करना चाहिए जो उसकी प्रशंसनीय दीप्ति या ज्योति मोक्षधाम में प्रदीप्त हो रही है, सो वहाँ अमृतभोग को स्तोता उपासकों के लिए इस लोक में—इस जीवन में आभरित कर देता है, यह उसकी महती कृपा है॥१॥
Special
ऋषिः—वसुश्रुतः (सबमें वसने वाले परमात्मा का श्रवण जिसने किया)॥ देवता—अग्निः (प्रकाशस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—पंक्तिः॥