Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 411

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रो꣣ म꣡दा꣢य वावृधे꣣ श꣡व꣢से वृत्र꣣हा꣡ नृभिः꣢꣯ । त꣢꣯मिन्म꣣ह꣢त्स्वा꣣जि꣢षू꣣ति꣡मर्भे꣢꣯ हवामहे꣣ स꣡ वाजे꣢꣯षु꣣ प्र꣡ नो꣢ऽविषत् ॥४११॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । वा꣣वृधे । श꣡व꣢꣯से । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । नृ꣡भिः꣢꣯ । तम् । इत् । म꣣ह꣡त्सु꣢ । आ꣣जि꣡षु꣢ । ऊ꣣ति꣢म् । अ꣡र्भे꣢꣯ । ह꣣वामहे । सः꣢ । वा꣡जे꣢꣯षु । प्र । नः꣣ । अविषत् ॥४११॥

Mantra without Swara
इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः । तमिन्महत्स्वाजिषूतिमर्भे हवामहे स वाजेषु प्र नोऽविषत् ॥

इन्द्रः । मदाय । वावृधे । शवसे । वृत्रहा । वृत्र । हा । नृभिः । तम् । इत् । महत्सु । आजिषु । ऊतिम् । अर्भे । हवामहे । सः । वाजेषु । प्र । नः । अविषत् ॥४११॥

Samveda - Mantra Number : 411
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(नृभिः) मुमुक्षुजनों द्वारा “नरो ह वै देवविशः” [जै॰ १.८९] (मदाय) आत्मतृप्ति के लिये “मद तृप्तियोगे” [चुरादि॰] (शवसे) आत्मबल के लिये “शवस्-बलनाम” [निघं॰ २.९] (इन्द्रः) परमात्मा (वावृधे) उपासना द्वारा स्वात्मा में बढ़ाया जाता है—अधिकाधिक साक्षात् किया जाता है “कर्मणि कर्तृप्रत्ययो व्यत्येन” (तम्-इत्-ऊतिम्) निश्चय उस रक्षक परमात्मा को (महत्सु-आजिषु) बड़े काम क्रोधादि शत्रुओं संघर्षों में “आजौ संग्रामनाम” [निघं॰ २.१७] (अर्भे) वासनामात्र दोषसंघर्ष में “अर्भके अवृद्धे” [निरु॰ ४.१५] (हवामहे) आमन्त्रित करते हैं (सः) वह (वाजेषु) समस्तबल वाले प्रसङ्गों में (नः) हमें (प्र-अविषत्) प्रबल रखें।
Essence
मुमुक्षुजनों द्वारा अपनी तृप्ति आत्मबल प्राप्ति के लिये उपासना से परमात्मा साक्षात् किया जाता है, उस रक्षक देव को कामक्रोधादि के संघर्षों में और गुप्त वासनासंघर्ष में आमन्त्रित करते हैं स्मरण करते हैं वह अन्य समस्त बलप्रसङ्गों में उनकी प्रबल रक्षा करता है॥३॥
Special
ऋषिः—गोतमः (परमात्मा में अत्यन्त गतिमान्)॥