Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 407

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
सी꣡द꣢न्तस्ते꣣ व꣢यो꣣ य꣢था꣣ गो꣡श्री꣢ते꣣ म꣡धौ꣢ मदि꣣रे꣢ वि꣣व꣡क्ष꣢णे । अ꣣भि꣡ त्वामि꣢꣯न्द्र नोनुमः ॥४०७॥

सी꣡द꣢꣯न्तः । ते꣣ । व꣡यः꣢꣯ । य꣡था꣢꣯ । गो꣡श्री꣢꣯ते । गो । श्री꣣ते । म꣡धौ꣢꣯ । म꣣दिरे꣢ । वि꣣व꣡क्ष꣢णे । अ꣣भि꣢ । त्वाम् । इ꣣न्द्र । नोनुमः ॥४०७॥

Mantra without Swara
सीदन्तस्ते वयो यथा गोश्रीते मधौ मदिरे विवक्षणे । अभि त्वामिन्द्र नोनुमः ॥

सीदन्तः । ते । वयः । यथा । गोश्रीते । गो । श्रीते । मधौ । मदिरे । विवक्षणे । अभि । त्वाम् । इन्द्र । नोनुमः ॥४०७॥

Samveda - Mantra Number : 407
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(गोश्रीते) स्तुतिवाणियों से पके (मधौ) मधुर—(मदिरे) हर्षकर—(विवक्षणे) विशिष्ट वक्षणा आनन्दधारा जहाँ ऐसे उपासनास्थान में (सीदन्तः-ते वयः-यथा) बैठते हुए वे मधुमक्खियाँ जैसे, ऐसे हम बैठते हुए (इन्द्र) हे परमात्मन्! (त्वाम्-नोनुमः) तुझे पुनः पुनः नमस्कार करते हैं।
Essence
स्तुतियों से पके मधुर आनन्दकर विशिष्ट उपासनाधारा वाले उपासना सदन में मधुमक्खियों की भाँति बैठते हुए तुझ परमात्मा को पुनः पुनः प्रणाम करते हैं॥९॥
Special
ऋषिः—सौभरिः (परमात्मा को अपने अन्दर भरित करने वाला उपासक)॥