Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 389

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣢꣫ एक꣣ इ꣢द्वि꣣द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ म꣡र्ता꣢य दा꣣शु꣡षे꣢ । ई꣡शा꣢नो꣣ अ꣡प्र꣢तिष्कुत꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ ॥३८९॥

यः꣢ । ए꣡कः꣢꣯ । इत् । वि꣣द꣡य꣢ते । वि꣣ । द꣡य꣢꣯ते । व꣡सु꣢꣯ । म꣡र्ता꣢꣯य । दा꣣शु꣡षे꣢ । ई꣡शा꣢꣯नः । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतः । अ । प्र꣣तिष्कुतः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣣ङ्ग꣢ ॥३८९॥

Mantra without Swara
य एक इद्विदयते वसु मर्ताय दाशुषे । ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग ॥

यः । एकः । इत् । विदयते । वि । दयते । वसु । मर्ताय । दाशुषे । ईशानः । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिष्कुतः । इन्द्रः । अङ्ग ॥३८९॥

Samveda - Mantra Number : 389
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यः-एकः-इत्) जो एक ही—उस जैसा अन्य नहीं, कि (दाशुषे मर्ताय) आत्मीयत्व के देने वाले—स्वात्मसमर्पण करने वाले जन—उपासक के लिए (वसु विदयते) धन को विशिष्टरूप से देता है या कर्मानुसार विभाग करता है (अङ्ग) हे प्रियजन वह (ईशानः-इन्द्रः) स्वामी परमात्मा (अप्रतिष्कुतः) उल्लङ्घनीय या प्रतिहिंसित या प्रतिस्खलित या प्रतीकार्य नहीं है। “अप्रतिष्कुतोऽप्रतिष्कृतोऽ-प्रतिस्खलितो वा” [निरु॰ ६.१६]।
Essence
केवल परमात्मा ही ऐसा उदार है जो आत्मसमर्पण करने वाले उपासक के लिए—अलौकिक धन अपने अन्दर वसाने वाले विशिष्ट धन को विशेषरूप से देता है या विभक्त कर छाँट कर देता है और वह जगत् का स्वामी दृष्टि से ओझल करने योग्य या प्रतीकार करने योग्य नहीं॥९॥
Special
ऋषिः—गौतमः (परमात्मा में अत्यधिक गति रखने वाला)॥