Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 380

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ म꣣न्दि꣡ने꣢ पितु꣣म꣡द꣢र्च꣣ता व꣢चो꣣ यः꣢ कृ꣣ष्ण꣡ग꣢र्भा नि꣣र꣡ह꣢न्नृ꣣जि꣡श्व꣢ना । अ꣣वस्य꣢वो꣣ वृ꣡ष꣢णं꣣ व꣡ज्र꣢दक्षिणं म꣣रु꣡त्व꣢न्तꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ हुवेमहि ॥३८०॥

प्रं꣢ । म꣣न्दि꣡ने꣢ । पि꣣तुम꣢त् । अ꣣र्चत । व꣡चः꣢꣯ । यः । कृ꣣ष्ण꣡ग꣢र्भाः । कृ꣣ष्ण꣢ । ग꣣र्भाः । निर꣡ह꣢न् । निः꣣ । अ꣡ह꣢꣯न् । ऋ꣣जि꣡श्व꣢ना । अ꣣वस्य꣡वः꣢ । वृ꣡ष꣢꣯णम् । व꣡ज्र꣢꣯दक्षिणम् । व꣡ज्र꣢꣯ । द꣣क्षिणम् । मरु꣡त्व꣢न्तम् । स꣣ख्या꣡य꣢ । स꣣ । ख्या꣡य꣢꣯ । हु꣣वेमहि ॥३८०॥

Mantra without Swara
प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना । अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तꣳ सख्याय हुवेमहि ॥

प्रं । मन्दिने । पितुमत् । अर्चत । वचः । यः । कृष्णगर्भाः । कृष्ण । गर्भाः । निरहन् । निः । अहन् । ऋजिश्वना । अवस्यवः । वृषणम् । वज्रदक्षिणम् । वज्र । दक्षिणम् । मरुत्वन्तम् । सख्याय । स । ख्याय । हुवेमहि ॥३८०॥

Samveda - Mantra Number : 380
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(मन्दिने) स्तुति करने योग्य परमात्मा के लिए “मन्दी मन्दतेः स्तुतिकर्मणः” [निरु॰ ४.२४] (पितुमत्-वचः) प्यायन—प्रसन्नता कारक वचन “पितुः प्यायतेर्वा” [निघं॰ ९.२४] (प्रार्चत) प्रार्चित करो—भेंट समर्पित करो (यः) जो परमात्मा (ऋजिश्वना) सरलगति शक्ति से (कृष्णगर्भाः) पाप जिनके गर्भ में—अन्दर है—पापगर्भित वृत्तियों वासनाओं को (निरहन्) निर्हत कर देता है (वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तम्) उस सुखवर्षक ओज के प्रेरक प्राणवान् सबमें प्राणप्रद परमात्मा को (सख्याय) मित्रभाव के लिए (अवस्यवः) हम रक्षा चाहने वाले (हुवेमहि) आमन्त्रित करें।
Essence
परमात्मा हमारी पापगर्भित वृत्तियों को अपने सरल स्वभाव से नष्ट कर देता है यदि हम उस स्तुति करने योग्य के लिए प्रसन्नताकारक स्तुतिवचन अर्पित करें। उस ऐसे सुखवर्षक ओज के प्रसारक प्राणसञ्चारक परमात्मदेव को मित्रता के लिए हम अपनी रक्षा चाहने वाले उपासक नित्य निरन्तर हृदय में आमन्त्रित करते रहें॥११॥
Footnote
[*31. “कुत्सः कर्ता स्तोमानान्” [निरु॰ ३.११]।]
Special
ऋषिः—कुत्सः (परमात्मा की स्तुति करने वाला*31)॥ छन्दः—जगती॥