Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 370

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- रेभः काश्यपः Chhand- अति जगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वि꣢श्वाः꣣ पृ꣡त꣢ना अभि꣣भू꣡त꣢रं꣣ न꣡रः꣢ स꣣जू꣡स्त꣢तक्षु꣣रि꣡न्द्रं꣢ जज꣣नु꣡श्च꣢ रा꣣ज꣡से꣢ । क्र꣢त्वे꣣ व꣡रे꣢ स्थे꣢म꣢न्या꣣मु꣡री꣢मु꣣तो꣡ग्रमोजि꣢꣯ष्ठं त꣣र꣡सं꣢ तर꣣स्वि꣡न꣢म् ॥३७०॥

वि꣡श्वाः꣢꣯ । पृ꣡त꣢꣯नाः । अ꣣भिभू꣡त꣢रम् । अ꣣भि । भू꣡त꣢꣯रम् । न꣡रः꣢꣯ । स꣣जूः꣢ । स꣣ । जूः꣢ । त꣣तक्षुः । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ज꣣जनुः꣢ । च꣣ । राज꣡से꣢ । क्र꣡त्वे꣢꣯ । व꣡रे꣢꣯ । स्थे꣣म꣡नि꣢ । आ꣣मु꣡री꣢म् । आ꣣ । मु꣡री꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । उ꣣ग्र꣢म् । ओ꣡जि꣢꣯ष्ठम् । त꣣र꣡स꣢म् । त꣣रस्वि꣡न꣢म् ॥३७०॥

Mantra without Swara
विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरः सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे । क्रत्वे वरे स्थेमन्यामुरीमुतोग्रमोजिष्ठं तरसं तरस्विनम् ॥

विश्वाः । पृतनाः । अभिभूतरम् । अभि । भूतरम् । नरः । सजूः । स । जूः । ततक्षुः । इन्द्रम् । जजनुः । च । राजसे । क्रत्वे । वरे । स्थेमनि । आमुरीम् । आ । मुरीम् । उत । उग्रम् । ओजिष्ठम् । तरसम् । तरस्विनम् ॥३७०॥

Samveda - Mantra Number : 370
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(नरः) मुमुक्षुजन “नरो ह वै देवविशः” [जै॰ १.८९] (सजूः) सजोषण—समानभावना से युक्त हो “सजूः-सजोषणः” [निरु॰ ९.१२] (इन्द्रं विश्वाः पृतनाः-अभिभूतरम्) परमात्मा को अपनी समस्त विरोधी प्रतिकूल प्रवृत्तियों पर “पृतनां द्विषन्तं भ्रातृव्य.....” [जै॰ २.९१] अत्यन्त अभिभव करने वाला (ततक्षुः) करा—निश्चित करा “ततक्षुः-चक्रुः” [निरु॰ ६.२७] (च) और (राजसे जजनुः) स्वयं भी उन पर अधिकार पाने को “राजति-ऐश्वर्यकर्मा” [निघं॰ २.२१] सुन्दर प्रादुर्भूत किया—साक्षात् किया (क्रत्वे) अध्यात्मकर्म के लिये (वरे स्थेमनि) वरते हैं जहाँ रहें उस ऐसे हृदयस्थान में (आमुरीम्) वासना को समन्तरूप से मारने वाले—(उत) और (उग्रम्-ओजिष्ठम्) तेजस्वी भारी ओजवाले (तरसं तरस्विनम्) बलस्वरूप बलवान् को धारण करते हैं।
Essence
स्तोता जन अपने समस्त विरोधी भावों को दबा देने वाले परमात्मा को ही निश्चित करते हैं तथा स्वयं अपने में उनपर अधिकार करने को उसे अन्दर साक्षात् करते हैं, अध्यात्म कर्म करने के लिए, वरण करने के लिए हृदय स्थान में उस वासनाओं के समन्त रूप से मार देने वाले बड़े तेजस्वी ओजस्वी बलरूप बलवान् परमात्मा को उपासित करते हैं॥१॥
Footnote
[*29. “रेभति-अर्चतिकर्मा” [निघं॰ ३.१४]।]
Special
ऋषिः—रेभः (परमात्मा की अर्चना करने वाला*29)॥ छन्दः—जगती॥