Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 369

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ऋ꣢च꣣ꣳ सा꣡म꣢ यजामहे꣣ या꣢भ्यां꣣ क꣡र्मा꣢णि कृ꣣ण्व꣡ते꣢ । वि꣡ ते सद꣢꣯सि राजतो य꣣ज्ञं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ वक्षतः ॥३६९॥

ऋ꣡च꣢꣯म् । सा꣡म꣢꣯ । य꣣जामहे । या꣡भ्या꣢꣯म् । क꣡र्मा꣢꣯णि । कृ꣣ण्व꣡ते꣢ । वि । ते꣡इति꣢ । स꣡द꣢꣯सि । रा꣣जतः । यज्ञ꣢म् । दे꣣वे꣡षु꣢ । व꣣क्षतः ॥३६९॥

Mantra without Swara
ऋचꣳ साम यजामहे याभ्यां कर्माणि कृण्वते । वि ते सदसि राजतो यज्ञं देवेषु वक्षतः ॥

ऋचम् । साम । यजामहे । याभ्याम् । कर्माणि । कृण्वते । वि । तेइति । सदसि । राजतः । यज्ञम् । देवेषु । वक्षतः ॥३६९॥

Samveda - Mantra Number : 369
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(ऋचं साम यजामहे) परमात्मा की स्तुति और उपासना का हम सेवन करें (याभ्यां कर्माणि कृण्वते) जिनके द्वारा—जिनके सेवन के साथ श्रेष्ठकर्म करते हैं (ते) वे दोनों (सदसि) हमारे हृदयसदन में (विराजतः) विशेषरूप से बने रहें, स्थान जमावें (यज्ञं देवेषु वक्षतः) हमारे अध्यात्म यज्ञ को हमारी समस्त इन्द्रियों में प्रवाहित करें।
Essence
समस्त श्रेष्ठ कर्मों को परमात्मा की स्तुति उपासना से आरम्भ करना चाहिए, हमारे हृदय में स्तुति उपासना घर कर जावें और हमारी इन्द्रियों में अध्यात्मता का सञ्चार कर दें जिससे इन्द्रियाँ असंयम का कार्य न कर सकें॥१०॥
Special
ऋषिः—वामदेवः (वननीय उपासनीय देव जिसका है)॥ देवता—ऋक्सामे ‘इन्द्रसम्बद्धे’ (ऐश्वर्यवान् परमात्मा के ऋक्साम—स्तुति उपासना)॥