Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 349

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- तिरश्चीराङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ गि꣡रो꣢ र꣣थी꣢रि꣣वा꣡स्थुः꣢ सु꣣ते꣡षु꣢ गिर्वणः । अ꣣भि꣢ त्वा꣣ स꣡म꣢नूषत꣣ गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥३४९॥

आ꣢ । त्वा꣣ । गि꣡रः꣢꣯ । र꣣थीः꣢ । इव । अ꣡स्थुः꣢꣯ । सु꣣ते꣡षु꣢ । गि꣣र्वणः । गिः । वनः । अभि꣢ । त्वा꣣ । स꣢म् । अ꣣नूषत । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ ॥३४९॥

Mantra without Swara
आ त्वा गिरो रथीरिवास्थुः सुतेषु गिर्वणः । अभि त्वा समनूषत गावो वत्सं न धेनवः ॥

आ । त्वा । गिरः । रथीः । इव । अस्थुः । सुतेषु । गिर्वणः । गिः । वनः । अभि । त्वा । सम् । अनूषत । गावः । वत्सम् । न । धेनवः ॥३४९॥

Samveda - Mantra Number : 349
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(गिर्वणः) हे स्तुतिवाणियों से वननीय सेवनीय परमात्मन्! (त्वा) तेरे प्रति—तुुझे पाकर (सुतेषु) सम्पन्न उपासना प्रसङ्गों (गिरः) स्तुतियाँ (आस्थुः) आश्रित हो जाती हैं (रथीः-इव) जैसे रथवान् गन्तव्य—प्राप्तव्य स्थान को पाकर उसे आश्रित होते हैं (त्वा-अभि समनूषत) तुझे लक्ष्य कर झुकती हैं—आकर्षित होती हैं (धेनवः-गावः न वत्सम्) दूध पिलाने वाली गौएँ जैसे दूध पिलाने के स्नेहवश बछड़े के प्रति झुक जाती हैं—आकर्षित होती हैं।
Essence
हमारी स्तुतियाँ परमात्मा के प्रति ऐसी होनी चाहिए जैसे यात्री अपने गन्तव्य स्थान पर जाकर ही विश्राम पाता है ऐसे परमात्मा में विश्राम पायें, मध्य में विश्राम न करें तथा वे परमात्मा के प्रति ऐसी भावभरी हुई स्तुतियाँ हों जैसे दूधभरी गौएँ स्नेह में भर बछड़े की ओर झुकी जाया करती हैं, उसकी ओर आकर्षित होती जाती हैं॥८॥
Special
ऋषिः—तिरश्ची (परमात्मा का अन्दर ध्यान करने वाला)॥