Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 348

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नीपातिथिः काण्वः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣡न्द्र꣢ याहि꣣ ह꣡रि꣢भि꣣रु꣢प꣣ क꣡ण्व꣢स्य सुष्टु꣣ति꣢म् । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥३४८॥

आ꣢ । इ꣣न्द्र । याहि । ह꣡रि꣢꣯भिः । उ꣡प꣢꣯ । क꣡ण्व꣢꣯स्य । सु꣣ष्टुति꣢म् । सु꣣ । स्तुति꣢म् । दि꣣वः꣢ । अ꣣मु꣡ष्य꣢ । शा꣡स꣢꣯तः । दि꣡व꣢꣯म् । य꣣य꣢ । दि꣣वावसो । दिवा । वसो ॥३४८॥

Mantra without Swara
एन्द्र याहि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम् । दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो ॥

आ । इन्द्र । याहि । हरिभिः । उप । कण्वस्य । सुष्टुतिम् । सु । स्तुतिम् । दिवः । अमुष्य । शासतः । दिवम् । यय । दिवावसो । दिवा । वसो ॥३४८॥

Samveda - Mantra Number : 348
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! तू (हरिभिः) दुःखाज्ञानापहरण करने वाली तथा सुखज्ञानाहरण करनेवाली शक्तिधाराओं के साथ “हरयः-हरणा” [निरु॰ ७.२४] (कण्वस्य सुष्टुतिम्) मेधावी वक्ता की शोभन स्तुति को (उपायाहि) उपागत हो—स्वीकार कर (दिवावसो) हे प्रकाशधन वाले! या प्रकाश में वसानेवाले परमात्मन्! (अमुष्य दिवः-शासतः) उस प्रकाशमय अमर लोक मोक्ष का शासन करते हुए के अपने (दिवं यय) प्रकाशमय अमृतधाम को मुझे ले जा—पहुँचा।
Essence
परमात्मन्! तू प्रकाशधन वाला या प्रकाश में वसाने वाला है क्या ही अच्छा हो मुझ मेधावी वक्ता उपासक की सुन्दर हार्दिक स्तुति को स्वीकार कर, उस अपने प्रकाशमय धाम को मुझे ले चले जिसका तू शासन करता है। अवश्य सुन्दर हार्दिक स्तुति का फल यह देगा॥७॥
Footnote
[*27. “नि-अप्-नीपः” “द्व्यन्तरुपसर्गोभ्योऽप ईत्” [अष्टा॰ ६.३.९५]।]
Special
ऋषिः—काण्वो नीपातिथिः (मेधावी का पुत्र परमात्मा के निकट पहुँचनेवाला यात्री*27)॥