Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 34

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
क꣡स्य꣢ नू꣣नं꣡ प꣢꣯रीणसि꣣ धि꣡यो꣢ जिन्वसि सत्पते । गो꣡षा꣢ता꣣ य꣡स्य꣢ ते꣣ गि꣡रः꣢ ॥३४॥

क꣡स्य꣢꣯ । नू꣣न꣢म् । प꣡री꣢꣯णसि । प꣡रि꣢꣯ । न꣣सि । धि꣡यः꣢꣯ । जि꣣न्वसि । सत्पते । सत् । पते । गो꣡षा꣢꣯ता । गो꣢ । सा꣣ता । य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । गि꣡रः꣢꣯ ॥३४॥

Mantra without Swara
कस्य नूनं परीणसि धियो जिन्वसि सत्पते । गोषाता यस्य ते गिरः ॥

कस्य । नूनम् । परीणसि । परि । नसि । धियः । जिन्वसि । सत्पते । सत् । पते । गोषाता । गो । साता । यस्य । ते । गिरः ॥३४॥

Samveda - Mantra Number : 34
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सत्पते) हे सत्पुरुषों मुमुक्षुओं के पालक परमात्मन्! (कस्य नूनम्) किसी के फिर “नूनं तर्के” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] (धियः) ‘मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार’ प्रज्ञानों को “धीः प्रज्ञानाम” [निघं॰ ३.१] (परिणसि) भूमा में—मोक्ष में “परिणसा बहुनाम” [निघं॰ ३.१] “भूमा वै सुखम्” [श॰ ३.१.१.१२] (जिन्वसि) तृप्त करता है (ते गिरः-यस्य गोषाताः) तेरे लिये जिसकी स्तुतियाँ इन्द्रियों में संसेवित—संगत हो गईं।
Essence
हे परमात्मन्! तेरे लिये की हुई स्तुतियाँ जिसकी इन्द्रियों में बैठ जाती हैं, चरितार्थ हो जाती हैं, इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय से विरत हो तेरी स्तुतियों में लग जाती हैं, वही उपासक महान् आनन्द या महान् धाम—मोक्ष को प्राप्त होता है। उसी जीवन्मुक्त का अन्तःकरण चतुष्टय तृप्त होता है, उसी पर तेरी परम कृपा होती है॥१४॥
Special
ऋषिः—उशनाः (कल्याण की कामना करने वाला उपासक)॥