Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 334

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विमद ऐन्द्रः, वसुकृद्वा वासुक्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡जा꣢मह꣣ इ꣢न्द्रं꣣ व꣡ज्र꣢दक्षिण꣣ꣳ ह꣡री꣢णाꣳ र꣣थ्यां꣢३꣱वि꣡व्र꣢तानाम् । प्र꣡ श्मश्रु꣢꣯भि꣣र्दो꣡धु꣢वदू꣣र्ध्व꣡धा꣢ भुव꣣द्वि꣡ सेना꣢꣯भि꣣र्भ꣡य꣢मानो꣣ वि꣡ राध꣢꣯सा ॥३३४॥

य꣡जा꣢꣯महे । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । व꣡ज्र꣢꣯दक्षिणम् । व꣡ज्र꣢꣯ । द꣣क्षिणम् । ह꣡री꣢꣯णाम् । र꣣थ्या꣢꣯म् । वि꣡व्र꣢꣯तानाम् । वि । व्र꣣तानाम् । प्र꣢ । श्म꣡श्रु꣢꣯भिः । दो꣡धु꣢꣯वत् । ऊ꣣र्ध्व꣡धा꣢ । भु꣣वत् । वि꣢ । से꣡ना꣢꣯भिः । भ꣡य꣢꣯मानः । वि । रा꣡ध꣢꣯सा ॥३३४॥

Mantra without Swara
यजामह इन्द्रं वज्रदक्षिणꣳ हरीणाꣳ रथ्यां३विव्रतानाम् । प्र श्मश्रुभिर्दोधुवदूर्ध्वधा भुवद्वि सेनाभिर्भयमानो वि राधसा ॥

यजामहे । इन्द्रम् । वज्रदक्षिणम् । वज्र । दक्षिणम् । हरीणाम् । रथ्याम् । विव्रतानाम् । वि । व्रतानाम् । प्र । श्मश्रुभिः । दोधुवत् । ऊर्ध्वधा । भुवत् । वि । सेनाभिः । भयमानः । वि । राधसा ॥३३४॥

Samveda - Mantra Number : 334
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वज्रदक्षिणम्) “वज्रदक्षी” ओज के प्रेरक “दक्ष गतिवृद्ध्योः” [भ्वादि॰] (विव्रतानां हरीणां रथ्यम्) विगतकर्म—विपरीत गतिकर्म वाले प्राणों—इन्द्रियों के “प्रणो वै हरिः” [कौ॰ १७.१] “प्राणा इन्द्रियाणि” [काठ॰ ८.१] रथ—शरीररथ के चालक (इन्द्रम्) परमात्मा को (यजामहे) हम यजन करें—अध्यात्मयज्ञ में स्तुत करें (श्मश्रुभिः) शरीर में श्रवण करने वाली अपनी ज्ञान शक्तियों से (दोधुवत्) पाप को कम्पाता हुआ (ऊर्ध्वधाः) हमें ऊपर स्थापित करने वाला है (सेनाभिः) “इनेन स्वामिना सह वर्तमानाः शक्तयः” इन्द्र—परमात्मा के साथ रहने वाली पापनाशक शक्तियों से पापीजन को (भयमानः) डराता हुआ ‘अन्तर्गत णिजर्थश्छान्दसः’ (राधसा वि) धनैश्वर्य—अर्थसिद्धि से विगत कर (भुवत्) विराजमान हो जाता है।
Essence
ओजः—उत्साहवर्धक तथा विपरीत गति वाले इन्द्रिय घोड़ों के शरीररूप रथ के चालक परमात्मा की हम स्तुति करते हैं। जो अपनी ज्ञानशक्तियों से पापी को कम्पाता हुआ उपासक आत्मा को ऊँचे स्थापित करता है तथा अपनी व्यापन शक्तियों से पापी को डराता हुआ ऐश्वर्य सिद्धि से विगत करके विराजमान होता है॥३॥
Special
ऋषिः—वसुक्रो विमदो वा (अध्यात्मधन का सम्पादनकर्ता या विगतमद—विरक्त उपासक)॥