Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 314

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
यो꣡नि꣢ष्ट इन्द्र꣣ स꣡द꣢ने अकारि꣣ त꣡मा नृभिः꣢꣯ पुरूहूत꣣ प्र꣡ या꣢हि । अ꣢सो꣣ य꣡था꣢ नोऽवि꣣ता꣢ वृ꣣ध꣢श्चि꣣द्द꣢दो꣣ व꣡सू꣢नि म꣣म꣡द꣢श्च꣣ सो꣡मैः꣢ ॥३१४॥

यो꣡निः꣢꣯ । ते꣣ । इन्द्र । स꣡द꣢꣯ने । अ꣣कारि । त꣢म् । आ । नृ꣡भिः꣢꣯ । पु꣣रूहूत । पुरु । हूत । प्र꣢ । या꣢हि । अ꣡सः꣢꣯ । य꣡था꣢꣯ । नः꣣ । अविता꣢ । वृ꣣धः꣢ । चि꣣त् । द꣡दः꣢꣯ । व꣡सू꣢꣯नि । म꣣म꣡दः꣢ । च꣣ । सो꣡मैः꣢꣯ ॥३१४॥

Mantra without Swara
योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमा नृभिः पुरूहूत प्र याहि । असो यथा नोऽविता वृधश्चिद्ददो वसूनि ममदश्च सोमैः ॥

योनिः । ते । इन्द्र । सदने । अकारि । तम् । आ । नृभिः । पुरूहूत । पुरु । हूत । प्र । याहि । असः । यथा । नः । अविता । वृधः । चित् । ददः । वसूनि । ममदः । च । सोमैः ॥३१४॥

Samveda - Mantra Number : 314
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमात्मन्! (सदने) हृदयसदन में (ते योनिः-अकारि) तेरा घर—अवकाशरूप स्थान बनाया है “योनिः-गृहम्” [निघं॰ ३.४] (पुरुहूत) हे बहुत प्रकार से बुलाने योग्य परमात्मन्! (नृभिः-आ प्र याहि) हम दिव्य प्रजाओं उपासक आत्माओं के साथ “नरो ह वै देवविशः” [जै॰ १.८९] समन्तरूप से प्राप्त हो—विराजो (यथा नः-अविता वृधः-चित्-असः) जिस प्रकार हमारा रक्षकवर्धक भी हो—बने (वसूनि ददः) धनों को दे (च) और (सोमैः-ममदः) हमारे उपासनारसों से तू हर्षित हो।
Essence
हम उपासक जन अपने हृदय में परमात्मा के लिये अवकाश बनावें जिससे वह हम उपासक आत्माओं के साथ भली प्रकार विराजमान हो सके और विराजकर हमारा रक्षक तथा वृद्धिकर्ता भी हो सके हमारे वसाने योग्य उपयोगी ज्ञान धन भी दे सके यह सब हमारे उपासनारसों से प्रसन्न होकर ही कर सकेगा॥२॥
Special
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाला)॥ छन्दः—त्रिष्टुप्॥