Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 312

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नोधा गौतमः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ यो रि꣢꣯रि꣣क्ष꣡ ओज꣢꣯सा दि꣣वः꣡ सदो꣢꣯भ्य꣣स्प꣡रि꣢ । न꣡ त्वा꣢ विव्याच꣣ र꣡ज꣢ इन्द्र꣣ पा꣡र्थि꣢व꣣म꣢ति꣣ वि꣡श्वं꣢ ववक्षिथ ॥३१२॥

प्र꣢ । यः । रि꣣रिक्षे꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सा । दि꣣वः꣢ । स꣡दो꣢꣯भ्यः । प꣡रि꣢꣯ । न । त्वा꣣ । विव्याच । र꣡जः꣢꣯ । इ꣣न्द्र । पा꣡र्थिव꣢꣯म् । अ꣡ति꣢ । वि꣡श्व꣢꣯म् । व꣣वक्षिथ ॥३१२॥

Mantra without Swara
प्र यो रिरिक्ष ओजसा दिवः सदोभ्यस्परि । न त्वा विव्याच रज इन्द्र पार्थिवमति विश्वं ववक्षिथ ॥

प्र । यः । रिरिक्षे । ओजसा । दिवः । सदोभ्यः । परि । न । त्वा । विव्याच । रजः । इन्द्र । पार्थिवम् । अति । विश्वम् । ववक्षिथ ॥३१२॥

Samveda - Mantra Number : 312
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो तू इन्द्र—ऐश्वर्यवान् परमात्मा! (ओजसा) आत्मिक ओज—स्वगत आत्मस्वरूप बल से (दिवः-सदोभ्यः-परि) द्युमण्डल के प्रदेश सीमाओं से (प्ररिरिक्षे) प्रकर्ष से अर्थात् बहुत अतिरिक्त—पृथक् होकर भी वर्तमान है तथा (पार्थिवं रजः) पृथिवीक्षेत्र का रज—परिसीमित लोक—पिण्ड या धूलभाग (त्वा न विव्याच) तुझे नहीं व्यापता है, अपितु (विश्वम्-अति ववक्षिथ) विश्व का अतिक्रमण कर उसे वहन करता है सम्भालता चलाता है या हमें विश्व से अलग स्वरूप मोक्ष में ले जाना चाहता है।
Essence
परमात्मा सबल स्वात्मस्वरूप से द्युमण्डल के सीमावर्ती प्रदेश को पार किए हुए विराजमान हैं तथा पृथिवीक्षेत्र के सीमावर्ती लोक धूलभाग की व्याप्ति से परे है अपितु समस्त लोकमण्डल या संसार से अलग होकर उसे सम्भालने और चलाने वाला एवं विश्व से परे हमें मोक्ष में ले जाना चाहता है ऐसा एक मात्र परमात्मा है तब हम ऐसे परमात्मा के अनुकूल हों उसकी उपासना करें॥१०॥
Special
ऋषिः—नोधाः (नवन—स्तवन को धारण करने वाला)॥