Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 311

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ प्र꣡तू꣢र्तिष्व꣣भि꣡ विश्वा꣢꣯ असि꣣ स्पृ꣡धः꣢ । अ꣣शस्तिहा꣡ ज꣢नि꣣ता꣡ वृ꣢त्र꣣तू꣡र꣢सि꣣ त्वं꣡ तू꣢र्य तरुष्य꣣तः꣢ ॥३११॥

त्व꣢म् । इ꣣न्द्र । प्र꣡तू꣢꣯र्तिषु । प्र । तू꣣र्त्तिषु । अभि꣢ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣सि । स्पृ꣡धः꣢꣯ । अ꣣शस्तिहा꣢ । अ꣣शस्ति । हा꣢ । ज꣣निता꣢ । वृ꣣त्रतूः꣢ । वृ꣣त्र । तूः꣢ । अ꣣सि । त्व꣢म् । तू꣣र्य । तरुष्य꣢तः ॥३११॥

Mantra without Swara
त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः । अशस्तिहा जनिता वृत्रतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः ॥

त्वम् । इन्द्र । प्रतूर्तिषु । प्र । तूर्त्तिषु । अभि । विश्वाः । असि । स्पृधः । अशस्तिहा । अशस्ति । हा । जनिता । वृत्रतूः । वृत्र । तूः । असि । त्वम् । तूर्य । तरुष्यतः ॥३११॥

Samveda - Mantra Number : 311
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! (त्वम्) तू (प्रतूर्तिषु) हमारे आत्मभाव को हिंसित करने वाले प्रसङ्गों में होने वाला “प्रपूर्वकात्-तुर्वि हिंसार्थः” [भ्वादि॰] “अधिकरणे क्तिन्” (विश्वाः स्पृधः) समस्त विरोधी भावनाओं—आसुरी वृत्तियों को (अभि-असि) अभिभूत करता है—तिरस्कृत करता है—विनष्ट कर देता है (अशस्तिहा) अप्रशस्ति—अकीर्तिकर—अनिष्ट का नाशक अपितु (जनिता) शस्ति—कीर्तिकर अभीष्ट का जनयिता उत्पन्नकर्ता एवं (त्वम्) तू (तरुष्यतः-तूर्य) हे हिंसकों को हिंसित करने वाले! “तरुष्यति-हन्तिकर्मा” [निरु॰ ५.२] (वृत्रतूः-असि) पापों का नाशक है।
Essence
परमात्मा हम उपासकों के आत्मभाव को हिंसित करने वाले प्रसङ्गों में समस्त विरोधी वृत्तियों को उठने नहीं देता तथा अकीर्तिकर अनिष्ट को नष्ट करता और कीर्तिकर अभीष्ट को प्राप्त कराता है पापों को नष्टकर्ता अपितु हमें पीड़ा पहुँचाने वाले का भी नाशक बनता है॥
Special
ऋषिः—नृमेधः (नायक मेधा वाला)॥