Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 310

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्र꣣ या꣡व꣢त꣣स्त्व꣢मे꣣ता꣡व꣢द꣣ह꣡मीशी꣢꣯य । स्तो꣣ता꣢र꣣मि꣡द्द꣢धिषे रदावसो꣣ न꣡ पा꣢प꣣त्वा꣡य꣢ रꣳसिषम् ॥३१०॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । या꣡व꣢꣯तः । त्वम् । ए꣣ता꣡व꣢त् । अ꣣ह꣢म् । ई꣡शी꣢꣯य । स्तो꣣ता꣡र꣢म् । इत् । द꣣धिषे । रदावसो꣣ । रद । वसो । न꣢ । पा꣣पत्वा꣡य꣢ । रं꣣ऽसिषम् ॥३१०॥

Mantra without Swara
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय । स्तोतारमिद्दधिषे रदावसो न पापत्वाय रꣳसिषम् ॥

यत् । इन्द्र । यावतः । त्वम् । एतावत् । अहम् । ईशीय । स्तोतारम् । इत् । दधिषे । रदावसो । रद । वसो । न । पापत्वाय । रंऽसिषम् ॥३१०॥

Samveda - Mantra Number : 310
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(रदावसो-‘रदवसो’ इन्द्र) हे धन की खान परमात्मन्! “वसूनां धनानां रदः खनिः” “राजदन्तादिषु परम्” [अष्टा॰ २.२.३१] “वसुशब्दस्य परनिपातः” “रदति खनतिकर्मा” [निघं॰ २.२७] ‘रद्यते सुवर्णादिधनं यस्माद् स रदः’ घञर्थे कविधानम् (यद् यावतः) यदि जितने धन ज्ञान आदि का (त्वम्) स्वामी है (अहम्-ईशीय) मैं स्वामी हो जाऊँ तो (स्तोतारम्-इत्) स्तोता—स्तुति करने वाले के प्रति ही (दधिषे) धर दूँ—दे डालूँ (पापत्वाय) पापपन—पापी जन के लिये (न रंसिषन्) नहीं रमण चाहता—नहीं दूँ।
Essence
हे धन की खान परमात्मन्! जितने धन ऐश्वर्य का तू स्वामी है यदि उतने धन का मैं उपासक भी स्वामी बन जाऊँ तो स्तुति करने वाले को दे डालूँ धन की खान तू है मैं नहीं, यदि मैं भी होता तो माँगता क्यों! अतः तू मुझ स्तोता को अपना धन खुल कर दे। यह स्वार्थ धन प्राप्ति में हेतु भावनात्मक है। अतिशयालङ्कार दिया है, पापी को कभी न देता, तू पापी को न दे, परन्तु अपने उपासक धर्मात्मा को अवश्य दे और मैं दूँगा ही, जब तेरा उपासक इतना उदार है, तो तू भी तो महान् उदार है वस्तुतः तेरा धन तेरे लिये है ही नहीं, तूने तो उपासक के लिये ही रखा हुआ है॥८॥
Special
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाला उपासक)॥