Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 307

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ सो꣡म꣢स्य꣣ ग꣡ल्द꣢या꣣ स꣢दा꣣ या꣡च꣢न्न꣣हं꣡ ज्या꣢ । भू꣡र्णिं꣢ मृ꣣गं꣡ न सव꣢꣯नेषु चुक्रुधं꣣ क꣡ ईशा꣢꣯नं꣣ न या꣢चिषत् ॥३०७॥

आ꣢ । त्वा꣣ । सो꣡म꣢꣯स्य । ग꣡ल्द꣢꣯या । स꣣दा꣢꣯ । या꣡च꣢꣯न् । अ꣣हम् । ज्या꣣ । भू꣡र्णि꣢꣯म् । मृ꣣ग꣢म् । न । स꣡व꣢꣯नेषु । चु꣣क्रुधम् । कः꣢ । ई꣡शा꣢꣯नम् । न । या꣣चिषत् ॥३०७॥

Mantra without Swara
आ त्वा सोमस्य गल्दया सदा याचन्नहं ज्या । भूर्णिं मृगं न सवनेषु चुक्रुधं क ईशानं न याचिषत् ॥

आ । त्वा । सोमस्य । गल्दया । सदा । याचन् । अहम् । ज्या । भूर्णिम् । मृगम् । न । सवनेषु । चुक्रुधम् । कः । ईशानम् । न । याचिषत् ॥३०७॥

Samveda - Mantra Number : 307
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अहं सदा याचन्) मैं उपासक सदा याचना करता हुआ (त्वा भूर्णिम्) तुझ भरण पालन करने वाले परमात्मा को “भृञ् धारणपोषणयोः” [जुहो॰] “घृणिपृश्निपार्ष्णिचूर्णिभूर्णयः” [उणा॰ ४.५२] ‘निप्रत्ययान्तो निपात्यते’ (चुक्रधम्) ‘क्रोधयेयम्’ “क्रुधधातोर्णिजन्ताच्चङि छान्दसं रूपम्” मैं क्रुद्ध करूँ (आ) यह ऐसा करना भर्त्सनीय है मेरा निन्दनीय कर्म है “आ भर्त्सनाश्चर्ययोः” [अव्ययार्थ-निबन्धनम्] (ज्या मृगं न) ‘ज्या ज्यया’ वाणसहितधनुष डोरी से पीड़ित किए मृग—वन्य पशु को जैसे क्रुद्ध कर देते हैं ऐसी याचना से भरणकर्ता परमात्मा को मैं क्रुद्ध करूँ परन्तु (सवनेषु) अध्यात्म यज्ञावसरों में (सोमस्य गल्दया) उपासनारस के गालन—स्रावण से प्रवाहित प्रेरित करने के द्वारा मैं याचना करता हूँ “गल्दया गालनेन” [निरु॰ ६.२४] (कः-ईशानं न याचिषत्) कदाचित् क्रुद्ध होने की आशङ्का से कौन स्वामी को याचना नहीं कर सके—कर सकेगा।
Essence
भरणपोषण करने वाले परमात्मा से सदा याचना करके क्रुद्ध करना ही है विना उपासनारस प्रेरित—समर्पित करे, केवल याचना करते रहने से परमात्मा प्रसन्न नहीं होता, किन्तु बाण से ताडित सिंह की भाँति अपने पर उसे क्रुद्ध करना समझना चाहिए, हाँ अध्यात्मयज्ञ प्रसङ्गों में उसे उपासनारस समर्पण करते हुए याचना करें उस स्थिति में क्रुद्ध होने की आशङ्का नहीं, कौन होगा जो याचना न करे अर्थात् अभागा ही होगा॥५॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिर्मेध्याथिश्च (मेधा से निरन्तर गमन परमात्मा में प्रवेश करने वाला और पवित्र परमात्मा में निरन्तर प्रवेश करने वाला उपासक)॥