Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 303

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡त्यु꣢ अदर्श्याय꣣त्यू꣢३꣱च्छ꣡न्ती꣢ दुहि꣣ता꣢ दि꣣वः꣢ । अ꣡पो꣢ म꣣ही꣡ वृ꣢णुते꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ त꣢मो꣣ ज्यो꣡ति꣢ष्कृणोति सू꣣न꣡री꣢ ॥३०३॥

प्र꣡ति꣢꣯ । उ꣣ । अदर्शि । आयती꣢ । आ꣣ । यती꣢ । उ꣣च्छ꣡न्ती꣢ । दुहि꣣ता꣢ । दि꣣वः꣢ । अ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । मही꣢ । वृ꣣णुते । च꣡क्षु꣢꣯षा । त꣡मः꣢ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । कृ꣣णोति । सून꣡री꣢ । सु꣣ । न꣡री꣢꣯ ॥३०३॥

Mantra without Swara
प्रत्यु अदर्श्यायत्यू३च्छन्ती दुहिता दिवः । अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी ॥

प्रति । उ । अदर्शि । आयती । आ । यती । उच्छन्ती । दुहिता । दिवः । अप । उ । मही । वृणुते । चक्षुषा । तमः । ज्योतिः । कृणोति । सूनरी । सु । नरी ॥३०३॥

Samveda - Mantra Number : 303
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(दिवः-दुहिता) सूर्य की दुहिता—ज्ञानप्रकाशक परमात्मा को दूहने वाली श्रद्धा प्रज्ञा का उत्कृष्टरूप ज्ञानज्योति “श्रद्धा वै सूर्यस्य दुहिता” [श॰ १२.७.३.११] “प्रज्ञा पूर्वरूपं श्रद्धोत्तररूपम्” [शां—आ॰ ३.७, कौ॰ उ॰ १.७] (आयती) आती हुई—प्राप्त होती हुई (उच्छन्ती) अज्ञान एवं संसारमोह को हटाती हुई (प्रत्यदर्शि-उ) उपासकों द्वारा प्रतिलक्षित होती है प्रत्यक्ष होती है “लुप्तोपमावाचकालङ्कारः” जैसे (मही सूनरी) महत्त्ववाली उषा “सूनरी उषो नाम” [निघं॰ १.८] (चक्षुषा) ‘चक्षुषः’ ‘आकारादेशश्छान्दसः’ नेत्र के आगे आने वाले (तमः) अन्धकार को (उ-अपवृणुते) निश्चय हटाती है (ज्योतिः-कृणोति) प्रकाश को सामने करती है।
Essence
ज्ञानप्रकाशक परमात्मा की दूहने वाली उपासक के अन्दर उसके दर्शनामृत को खींच ले आनेवाली श्रद्धा जो कि प्रज्ञा से भी ऊँची ज्ञानज्योति उपासक के अन्दर आती हुई अज्ञान एवं सांसारिक मोह को हटाती मिटाती हुई उपासक द्वारा प्रत्यक्ष होती है जैसे महत्त्वपूर्ण प्रातःकालीन उषा—प्रभा नेत्र के आगे आने वाले अन्धकार को नितान्त हटाती है और प्रकाश को सामने कर देती है॥१॥
Special
ऋषिः—वसिष्ठ (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाला उपासक)॥ देवताः—उषा ‘इन्द्रप्रसक्तोषाः’ (ऐश्वर्यवान् परमात्मा से सम्बद्ध उषा—ज्ञानज्योति)॥