Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 302

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्वा꣢मि꣣दा꣡ ह्यो नरोऽपी꣢꣯प्यन्वज्रि꣣न्भू꣡र्ण꣢यः । स꣡ इ꣢न्द्र꣣ स्तो꣡म꣢वाहस इ꣣ह꣡ श्रु꣣ध्यु꣢प꣣ स्व꣡स꣢र꣣मा꣡ ग꣢हि ॥३०२॥

त्वा꣢म् । इ꣣दा꣢ । ह्यः । न꣡रः꣢꣯ । अ꣡पी꣢꣯प्यन् । व꣣ज्रिन् । भू꣡र्ण꣢꣯यः । सः । इ꣣न्द्र । स्तो꣡म꣢꣯वाहसः । स्तो꣡म꣢꣯ । वा꣣हसः । इह꣢ । श्रु꣣धि । उ꣡प꣢꣯ । स्व꣡स꣢꣯रम् । आ । ग꣣हि ॥३०२॥

Mantra without Swara
त्वामिदा ह्यो नरोऽपीप्यन्वज्रिन्भूर्णयः । स इन्द्र स्तोमवाहस इह श्रुध्युप स्वसरमा गहि ॥

त्वाम् । इदा । ह्यः । नरः । अपीप्यन् । वज्रिन् । भूर्णयः । सः । इन्द्र । स्तोमवाहसः । स्तोम । वाहसः । इह । श्रुधि । उप । स्वसरम् । आ । गहि ॥३०२॥

Samveda - Mantra Number : 302
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वज्रिन्) हे ओजस्वी परमात्मन्! “वज्रो वा ओजः” [श॰ ८.४.१.२०] (भूर्णयः-नरः) भरण—तुझे अपने अन्दर भरने स्थापित करने वाले उपासक जन (त्वाम्) तुझे (ह्यः) गए कल—गत समय में (इदा) और अब (अपीप्यन्) अपना उपासनारस पिलाते रहे—पिलाते हैं (सः) वह (इन्द्र) तू परमात्मन्! (इह) यहाँ फलदान प्रसङ्ग या वरदान प्रसङ्ग में या प्रतिदान प्रसङ्ग में (स्तोमवाहसः-उपश्रुधि) स्तुति को पहुँचाने वाले हम जनों को उपश्रुत कर—उपकृत कर अपना बना, अतः (स्वसरम्-आगहि) हमारे हृदय गृह को आ—प्राप्त हो “स्वसराणि गृहाणि” [निघं॰ ३.४] जिससे उनके अभीष्ट को जानकर हमें उपकृत कर सकें।
Essence
हे ओजस्वी परमात्मन्! तुझे अपने अन्दर भरने स्थापित करने वाले उपासक जन कल—पीछे और अब भी उपासनारस पान कराते रहे और अब भी पान कराते हैं, स्तुति पहुँचाने वाले उपासकों को भी उपकृत कर—करता है—उन हमको कभी उपेक्षित नहीं करता है अतः उपकृत करने के हेतु हमारे हृदय गृह को आ—प्राप्त हो॥१०॥
Special
ऋषिः—नृमेधः (नायक मेधावाला जन)॥