Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 30

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ वा꣡ज꣢पतिः क꣣वि꣢र꣣ग्नि꣢र्ह꣣व्या꣡न्य꣢क्रमीत् । द꣢ध꣣द्र꣡त्ना꣢नि दा꣣शु꣡षे꣢ ॥३०॥

प꣡रि꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯पतिः । वा꣡ज꣢꣯ । प꣣तिः । कविः꣢ । अ꣣ग्निः꣢ । ह꣣व्या꣡नि꣢ । अ꣣क्रमीत् । द꣡ध꣢꣯त् । र꣡त्ना꣢꣯नि । दा꣣शु꣡षे꣢ ॥३०॥

Mantra without Swara
परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत् । दधद्रत्नानि दाशुषे ॥

परि । वाजपतिः । वाज । पतिः । कविः । अग्निः । हव्यानि । अक्रमीत् । दधत् । रत्नानि । दाशुषे ॥३०॥

Samveda - Mantra Number : 30
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वाजपतिः कविः-अग्निः) अमृत अन्न भोग—मोक्षानन्द का स्वामी “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै॰ २.१९३] क्रान्तदर्शी सर्वज्ञ प्रकाशस्वरूप परमात्मा (दाशुषे रत्नानि दधत्) स्तुति हाव भाव पूर्ण आत्मसमर्पण करने वाले उपासक के लिये रत्नों—रमणीय अङ्गों उपकरणों को धारण कराने के हेतु (हव्यानि पर्यक्रमीत्) हावभाव पूर्ण स्तुतियों को परिप्राप्त करता है—स्वीकार करता है।
Essence
उपासक की हावभाव पूर्ण स्तुतियों को अमृतान्न भोग का स्वामी सर्वत्र अन्तर्यामी परमात्मा स्वीकार करता है और आत्मसमर्पणकर्ता उपासक के लिये रमणीय अङ्गों तथा स्वास्थ्य, मधुर वाणी, सुबुद्धि, धैर्य, शान्ति, अमृत भोग वररूप में शतगुणित सहस्रगुणितफल प्रदान करता है “देहि मे ददामि ते” [यजुः॰ ३.५०] “तू दे तो मैं तुझे देता हूँ” को चतिार्थ करता है॥१०॥
Special
ऋषिः—वामदेवः (वननीय उपास्य परमात्मदेव वाला)॥