Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 293

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣡ इन्द्रा꣢꣯य सुन्विरे꣣ सो꣡मा꣢सो꣣ द꣡ध्या꣢शिरः । ता꣡ꣳ आ मदा꣢य वज्रहस्त पी꣣त꣢ये꣣ ह꣡रि꣢भ्यां या꣣ह्यो꣢क꣣ आ꣢ ॥२९३॥

इ꣣मे꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सु꣣न्विरे । सो꣡मा꣢꣯सः । द꣡ध्या꣢꣯शिरः । द꣡धि꣢꣯ । आ꣣शिरः । ता꣢न् । आ । म꣡दा꣢꣯य । व꣣ज्रहस्त । वज्र । हस्त । पीत꣡ये꣢ । ह꣡रि꣢꣯भ्याम् । या꣣हि । ओ꣡कः꣢꣯ । आ । ॥२९३॥

Mantra without Swara
इम इन्द्राय सुन्विरे सोमासो दध्याशिरः । ताꣳ आ मदाय वज्रहस्त पीतये हरिभ्यां याह्योक आ ॥

इमे । इन्द्राय । सुन्विरे । सोमासः । दध्याशिरः । दधि । आशिरः । तान् । आ । मदाय । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । पीतये । हरिभ्याम् । याहि । ओकः । आ । ॥२९३॥

Samveda - Mantra Number : 293
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वज्रहस्त) विश्व का शासन हाथ में रखने वाले परमात्मन्! “वज्रः शासः” [श॰ ३.८.१.५] (इमे) ये (दध्याशिरः) दधिध्यान के आश्रय—आश्रित “दध्यङ् प्रत्यक्तो ध्यानमिति प्रत्यक्तमस्मिन् ध्यानमिति वा” [निरु॰ १२.३४] “आशीराश्रयणात्” [निरु॰ ६.८] (सोमासः) सोम-उपासनारस (इन्द्राय) तुझ ऐश्वर्यवान् परमात्मा के लिये (सुन्विरे) निष्पन्न किये गये हैं (तान्) उन्हें (मदाय) प्रीति के अर्थ (पीतये) पान करने-स्वीकार करने के लिये (आयाहि) आ-प्राप्त हो (हरिभ्याम्-ओकः-आ) दुःखाज्ञानापहरणशील तथा सुखाहरणशील ज्योति और आनन्द स्वरूपों से मेरे हृदय—आत्मा के निवास-गृह को आ प्राप्त हो। “ओक-इति निवासनाम” [निरु॰ ३.३]।
Essence
हे विश्व के शासन को सम्भालने वाले परमात्मन्! ये ध्यान चिन्तन से मिश्रित उपासनारस तुझ ऐश्वर्यवान् के लिये निष्पन्न हैं उन्हें हमारे प्रति प्रीति के निमित्त पान करने-स्वीकार करने के लिये प्राप्त हो, दुःख अज्ञान के अपहरण करने वाले तथा सुख के आहरण करने वाले अपने ज्योति और आनन्दमय स्वरूपों के साथ मेरे निवास स्थान हृदय गृह को प्राप्त हो॥१॥
Special
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त बसने वाला उपासक)॥