Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 290

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣भ꣡य꣢ꣳ शृ꣣ण꣡व꣢च्च न꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣र्वा꣢गि꣣दं꣡ वचः꣢꣯ । स꣣त्रा꣡च्या꣢ म꣣घ꣢वा꣣न्त्सो꣡म꣢पीतये धि꣣या꣡ शवि꣢꣯ष्ठ꣣ आ꣡ ग꣢मत् ॥२९०॥

उ꣣भ꣡य꣢म् । शृ꣣ण꣡व꣢त् । च꣣ । नः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣣र्वा꣢क् । इ꣣द꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । स꣣त्रा꣡च्या꣢ । स꣣त्रा꣢ । च्या꣣ । मघ꣡वा꣢न् । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये । धिया꣣ । श꣡वि꣢꣯ष्ठः । आ । ग꣣मत् ॥२९०॥

Mantra without Swara
उभयꣳ शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवान्त्सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत् ॥

उभयम् । शृणवत् । च । नः । इन्द्रः । अर्वाक् । इदम् । वचः । सत्राच्या । सत्रा । च्या । मघवान् । सोमपीतये । सोम । पीतये । धिया । शविष्ठः । आ । गमत् ॥२९०॥

Samveda - Mantra Number : 290
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (नः) हमारे (इदम्-उभयं वचः) इस दोनों प्रकार के स्तुतिवचन और उपासना वचन को (अर्वाकृ-शृणवत्) इधर अन्दर अन्तर्यामीरूप होकर सुनें (मघवा शविष्ठः) प्रशस्त ऐश्वर्यवान् अत्यन्त या सब बलों से युक्त परमात्मा (सत्रा धिया) सत्ययुक्त प्रज्ञा से—हित बुद्धि से (सोम-पीतये) उपासना रस को पान—स्वीकार करने के लिये (आगमत्) आवें।
Essence
परमात्मा हमारे इन दोनों स्तुति वचन और उपासना वचन को इधर अन्दर अन्तर्यामी रूप से सुने—सुनता है और वह ऐश्वर्यवान् अत्यन्त बलवान् या सभी बलों से युक्त हुआ सत्य प्रज्ञा—हित बुद्धि से उपासनारस स्वीकार करने के लिये आवें—आता है॥८॥
Special
ऋषिः—भर्गः (तेजस्वी उपासक)॥