Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 269

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢सु꣣ ह꣢व्य꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣म꣡त्सु꣢ भूषत । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि꣣ स꣡व꣢नानि वृत्रहन्परम꣣ज्या꣡ ऋ꣢चीषम ॥२६९॥

आ꣢ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯सु । ह꣡व्य꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । भू꣣षत । उ꣡प꣢꣯ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । स꣡व꣢꣯नानि । वृ꣣त्रहन् । वृत्र । हन् । परमज्याः꣢ । प꣣रम । ज्याः꣢ । ऋ꣣चीषम ॥२६९॥

Mantra without Swara
आ नो विश्वासु हव्यमिन्द्रꣳ समत्सु भूषत । उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहन्परमज्या ऋचीषम ॥

आ । नः । विश्वासु । हव्यम् । इन्द्रम् । समत्सु । स । मत्सु । भूषत । उप । ब्रह्माणि । सवनानि । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । परमज्याः । परम । ज्याः । ऋचीषम ॥२६९॥

Samveda - Mantra Number : 269
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विश्वासु समत्सु) समस्त प्रतिद्वन्द्वी प्रवृत्तियों में दैववृत्तियों आसुरवृत्तियों के संघर्षों में (हव्यम्-इन्द्रम्) आमन्त्रणीय परमात्मा को (आः-भूषत) आभूषित करो पूजित करो। यतः (ऋचीषम) स्तुति के अनुरूप फलप्रद “ऋचीषमः-ऋचा समः” [निरु॰ ६.२३] (परमज्याः) विरोधियों पर अलौकिक जय साधन वाला (वृत्रहन्) सर्वत्र “सुपां सुलुक्” [अष्टा॰ ७.३.३९] “सुलुक् छान्दसः” पापनाशक (नः) हमारे (ब्रह्माणि सवनानि) मन-बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, उपासना रस निष्पादन स्थानों को “मनो ब्रह्मेति व्यजानात्” [तै॰ आ॰ १०.६४.१] (उप—उपभूषत) उपभूषित कर अपने आनन्द स्वरूप से वासित कर।
Essence
उपासको! सारी विरोधी प्रवृत्तियों के प्रसङ्ग में आमन्त्रणीय परमात्मा को आहूत करो स्मरण करो जिससे वह उन पर परम जय साधन वाला पापनाशक स्तुति के अनुरूप फलप्रद परमात्मा हमारे मनों-मन, बुद्धि, चित्त अहङ्कार उपासना रस के निष्पादन स्थानों को उपभूषित करें अपने आनन्द स्वरूप से वासित कर दें॥७॥
Special
ऋषिः—नृमेधः पुरुमेधश्च (नायक बुद्धि वाला और बहुत बुद्धि वाला)॥