Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 26

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
नि꣡ त्वा꣢ नक्ष्य विश्पते द्यु꣣म꣡न्तं꣢ धीमहे व꣣य꣢म् । सु꣣वी꣡र꣢मग्न आहुत ॥२६॥

नि꣢ । त्वा꣣ । नक्ष्य । विश्पते । द्युम꣡न्त꣢म् । धी꣣महे । वय꣢म् सु꣣वी꣡र꣢म् । सु꣣ । वी꣡र꣢꣯म् । अ꣣ग्ने । आहुत । आ । हुत ॥२६॥

Mantra without Swara
नि त्वा नक्ष्य विश्पते द्युमन्तं धीमहे वयम् । सुवीरमग्न आहुत ॥

नि । त्वा । नक्ष्य । विश्पते । द्युमन्तम् । धीमहे । वयम् सुवीरम् । सु । वीरम् । अग्ने । आहुत । आ । हुत ॥२६॥

Samveda - Mantra Number : 26
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(नक्ष्य) हे व्याप्ति में समर्थ तथा प्राप्तव्य—शरण्य “नक्षति व्याप्तिकर्मा” [निघं॰ २.१६] “नक्षति गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] (विश्पते) प्रजाओं के पालक! (आहुत-अग्ने) हम उपासकों द्वारा अध्यात्म यज्ञ के निमित्त समन्त रूप से स्वीकार किए हुए ज्ञान प्रकाश-स्वरूप परमात्मन्! (त्वा) तुझ (द्युमन्तं सुवीरम्) ज्योतिष्मान् तथा अपने सुसिद्ध नियन्तृत्व आदि वीर्यों बलों से युक्त को “स ह वाव वीरो य आत्मन् एव वीर्यमनु वीरः” [जै॰ २.२८२] (वयं निधीमहे) हम उपासक अपने अन्दर धारण करें।
Essence
परमात्मन्! तू हम प्रजाओं का पालक राजा सब में व्याप्त और प्राप्तव्य है तू गुणों से प्रकाशमान और अपने सुसिद्ध नियन्तृत्वादि बलों से युक्त विश्व का राजा है, तेरे गुण और कर्मबल हमारे लिये कल्याणकारी हैं ग्राह्य हैं, तेरे शासन और शरण में हम तेरी सुप्रजा बनें अतः तुझे अपने अन्दर धारण करें ध्यावें॥६॥
Special
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त बसने वाला उपासक)॥