Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 258

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
बृ꣣ह꣡दिन्द्रा꣢꣯य गायत꣣ म꣡रु꣢तो वृत्र꣣ह꣡न्त꣢मम् । ये꣢न꣣ ज्यो꣢ति꣣र꣡ज꣢नयन्नृता꣣वृ꣡धो꣢ दे꣣वं꣢ दे꣣वा꣢य꣣ जा꣡गृ꣢वि ॥२५८॥

बृ꣣ह꣢त् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । गा꣣यत । म꣡रु꣢꣯तः । वृ꣣त्रह꣡न्त꣢मम् । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯मम् । ये꣡न꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । अ꣡ज꣢꣯नयन् । ऋ꣣तावृ꣡धः꣢ । ऋ꣣त । वृ꣡धः꣢꣯ । दे꣣व꣢म् । दे꣣वा꣡य꣢ । जा꣡गृ꣢꣯वि ॥२५८॥

Mantra without Swara
बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम् । येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि ॥

बृहत् । इन्द्राय । गायत । मरुतः । वृत्रहन्तमम् । वृत्र । हन्तमम् । येन । ज्योतिः । अजनयन् । ऋतावृधः । ऋत । वृधः । देवम् । देवाय । जागृवि ॥२५८॥

Samveda - Mantra Number : 258
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(मरुतः) अध्यात्म यज्ञ के याजक उपासक जनो! (वृत्रहन्तमं देवाय-इन्द्राय) वृत्रहन्ता-पापाज्ञाननाशक परमात्मदेव के लिये “वृत्रहन्तमम्”-सुपां सुपो भवन्तीतिङे स्थानेऽम् (बृहत्-गायत) बड़ा भारी गुणगान करो (येन) जिस गुणगान कर्म से (ऋतावृधः) परमात्मज्ञान को बढ़ाने वाले (देवं जागृवि ज्योतिः-अजनयन्) दिव्य-अलौकिक जागरणशील ज्योति को अपने अन्दर प्रादुर्भ्रूत करते हैं।
Essence
हे अध्यात्म यज्ञ के याजक उपासको! पापाज्ञाननाशक परमात्मदेव के लिये भारी गुणगान करो जिससे कि परमात्मज्ञान के बढ़ाने वाले दिव्य जागने वाली-निरन्तर चेताने वाली ज्योति को अपने अन्दर प्रकट किया करते हैं॥६॥
Special
ऋषिः—नृमेधः पुरुषमेधश्च (नायक बुद्धि वाला और पौरुष बुद्धि वाला उपासक)॥