Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 257

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य बृह꣣ते꣡ मरु꣢꣯तो꣣ ब्र꣡ह्मा꣢र्चत । वृ꣣त्र꣡ꣳ ह꣢नति वृत्र꣣हा꣢ श꣣त꣡क्र꣢तु꣣र्वज्रेण श꣣त꣡प꣢र्वणा ॥२५७॥

प्र꣢ । वः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । बृ꣣हते꣢ । म꣡रु꣢꣯तः । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । अ꣣र्चत । वृत्र꣢म् । ह꣢नति । वृत्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । श꣣त꣡क्र꣢तुः । श꣣त꣢ । क्र꣣तुः । व꣡ज्रे꣢꣯ण । श꣣त꣡प꣢र्वणा । श꣣त꣢ । प꣣र्वणा ॥२५७॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत । वृत्रꣳ हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा ॥

प्र । वः । इन्द्राय । बृहते । मरुतः । ब्रह्म । अर्चत । वृत्रम् । हनति । वृत्रहा । वृत्र । हा । शतक्रतुः । शत । क्रतुः । वज्रेण । शतपर्वणा । शत । पर्वणा ॥२५७॥

Samveda - Mantra Number : 257
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(मरुतः) हे अध्यात्म यज्ञ के याजक उपासक जनो! “मरुतः-ऋत्विङ् नामसु” [निघं॰ ३.१८] (वः) ‘यूयम्’ ‘विभक्तिव्यत्ययः’ तुम (बृहते-इन्द्राय) महान् परमात्मा के लिये (ब्रह्म प्र-अर्चत) तुम्हारे पास तुम्हारी बड़ी वस्तु मन है उस मन को अर्पित करो “मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म” [श॰ १४.६.१०.१२] (शतक्रतुः) बहुत प्रज्ञान और कर्म वाला (वृत्रहा) पापनाशक (शतपर्वणा वज्रेण) बहुत शक्तिसन्धान वाले शासन के “वज्रः शासः” [श॰ ३.८.१.५] (वृत्रं हनति) पाप को नष्ट करता है “शपो लुगभावश्छान्दसः”।
Essence
अध्यात्म यज्ञ के याजक उपासको! महान् परमात्मा के लिये अपने मन को अर्पित करो। वह बहुत प्रज्ञान कर्म वाला पाप संकल्प का नाशक, बहुत शक्ति सन्धान वाले शासन से तुम्हारे मन के पाप को नष्ट कर देता है॥
Special
ऋषिः—नृमेधः पुरुषमेधश्च (नायक बुद्धि वाला और पौरुष बुद्धि वाला उपासक)॥